उत्तराखंड में जनेऊ को बहुत पवित्र माना जाता है. पहाड़ में जनेऊ पहनने का विशेष महत्व होता है. मान्यता है कि जनेऊ धारण करने से आयु, बल और बुद्धि में वृद्धि होती है. जनेऊ धारण करने से शुद्ध चरित्र और जप, तप, व्रत की प्रेरणा मिलती है. पुराने समय में पहाड़ के प्रत्येक घर में जनेऊ बनाया जाता था. जनेऊ धारण करना 16 संस्कारों में विशेष संस्कार माना गया है.जनेऊ धारण करने से नैतिकता और मानवता के पुण्य कर्तव्यों को पूरा करने का आत्म बल मिलता है. जनेऊ धारण करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है. ऐसी मान्यता है कि मानव जीवन में जब तक लड़के को जनेऊ धारण नहीं कराया जाता तब तक उसे किसी भी संस्कार के लिए अपवित्र माना जाता है.
जनेऊ धारण करने के बाद ही लड़के को शादी, पूजा व अन्य धार्मिक कार्यक्रमों के लिए शुद्ध माना जाता है. वर्तमान में युवा पीढ़ी को आधुनिकता के साथ ही अपने संस्कारों को भी संरक्षित करके रखना चाहिए. साथ ही जनेऊ धारण के नियमों के बारे में जानकारी लेनी चाहिए.
जनेऊ का सनातन धर्म के साथ ही उत्तराखंड में भी विशेष महत्व है. मान्यता है कि जनेऊ धारण करने के बाद लड़के के जीवन में कई सकारात्मक परिवर्तन होते हैं. इसे धारण करने के बाद लड़का अपने घर और समाज के हिसाब से संतुलन बनाकर कार्य करता है. जनेऊ के बाद लड़के को संस्कारवान माना जाता है.
इसे धारण करने से शिक्षा और आध्यात्मिक विकास पर ध्यान केंद्रित करने में भी मदद मिलती है. साथ ही मन को बुरे कार्यों से बचाया जा सकता है. जनेऊ धारण करने से कई स्वास्थ्य संबंधी लाभ भी प्राप्त होते हैं, जैसे कब्ज, एसीडीटी, पेट रोग, मूत्रन्द्रीय रोग, रक्तचाप, हृदय के रोगों से मुक्ति मिलती है.
जनेऊ धारण करने के नियम
मानव जीवन में लड़का जब जनेऊ धारण करता है तो उसे विशेष नियमों का पालन करना होता है. जनेऊ को बाएं कंधे के ऊपर से दाई भुजा के नीचे पहना जाता है. जनेऊ के तीन या छह धागे (पल्ली) होते हैं, जिन्हें देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण का प्रतीक माना जाता है. विवाहित व्यक्ति या गृहस्थ व्यक्ति के लिए छह धागों वाला जनेऊ होता है. पुराने जमाने में जब घर में जनेऊ बनाया जाता था तो उसकी उंगलियों से नाप लेकर धागे को 96 बार लपेटा जाता था, तब जाकर एक जनेऊ तैयार होता है.