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ईरान में नए सुप्रीम लीडर से बढ़ा तनाव, तेल मार्गों को लेकर बढ़ीं चिंताएं

ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामेनेई की हत्या और उसके बाद नए नेता के तेजी से चुने जाने से ईरान, अमेरिका और इजराइल के बीच चल रहे संघर्ष को लेकर दुनिया भर में चिंता बढ़ गई है। इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप की अध्यक्ष कंफर्ट एकहाउसे एरो ने कहा कि इन घटनाओं से ईरान की रणनीति और आगे की सैन्य कार्रवाई पर बड़ा असर पड़ सकता है। एरो का कहना है कि मौजूदा युद्ध अचानक शुरू नहीं हुआ, बल्कि ईरान लंबे समय से इसकी तैयारी कर रहा था। खासकर पिछले साल ईरान, अमेरिका और इजराइल के बीच हुए 12 दिन के युद्ध के बाद से ही क्षेत्र में बड़े संघर्ष की जमीन तैयार हो गई थी। उन्होंने कहा कि हालिया घटनाएं पूरी तरह अप्रत्याशित नहीं हैं, क्योंकि ईरान पहले से ही ऐसी स्थिति के लिए तैयार था।

इस बीच संघर्ष का दायरा भी बढ़ता नजर आ रहा है। ईरान ने खाड़ी क्षेत्र के कई देशों पर भी हमले किए, जहां अमेरिका के सैन्य ठिकाने मौजूद हैं। एरो के अनुसार यह कदम ईरान की रणनीति का हिस्सा हो सकता है, ताकि युद्ध का दबाव सिर्फ एक जगह तक सीमित न रहे। इन घटनाओं के बाद हॉर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर भी चिंता बढ़ गई है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है। अगर यहां किसी तरह की रुकावट आती है तो वैश्विक तेल बाजार और ऊर्जा आपूर्ति पर बड़ा असर पड़ सकता है।

उधर ईरान के नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई ने क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बंद करने की मांग की है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो इन ठिकानों पर मिसाइल हमले हो सकते हैं। हालांकि एरो का कहना है कि यह बयान कोई नई बात नहीं है। ईरान लंबे समय से इस विचार का समर्थन करता रहा है कि मध्य पूर्व की सुरक्षा व्यवस्था में अमेरिका की भूमिका खत्म होनी चाहिए।

इसके विपरीत खाड़ी देशों और इजराइल का मानना है कि क्षेत्र की सुरक्षा के लिए अमेरिका की मौजूदगी जरूरी है। एरो ने यह भी चेतावनी दी कि इस युद्ध का असर सिर्फ सैन्य स्तर पर ही नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। उन्होंने कहा कि युद्ध में सिर्फ आम लोगों की जान ही नहीं जाती, बल्कि अर्थव्यवस्था, तेल बाजार और व्यापार भी प्रभावित होते हैं। उनके मुताबिक, तेल की आपूर्ति पर दबाव डालना और तेल के रास्तों को प्रभावित करना ईरान की रणनीति का हिस्सा हो सकता है, इसलिए यह स्थिति दुनिया के लिए चिंता का विषय है।

इस बीच कई देश पहले से ही ऊर्जा भंडार और तेल आपूर्ति को लेकर नई गणनाएं करने लगे हैं। एरो ने कहा कि भारत जैसे देश भी यह आकलन कर रहे हैं कि उनके पास मौजूद तेल भंडार कितने समय तक चल सकते हैं। वैश्विक बाजार को स्थिर रखने के लिए अमेरिका ने रूस के तेल पर लगे कुछ प्रतिबंधों में ढील देने का भी फैसला किया है, ताकि बाजार में ऊर्जा आपूर्ति बढ़ाई जा सके और तेल की कीमतों को नियंत्रित किया जा सके। एरो का कहना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव कूटनीति, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डाल सकता है। इसके कारण महंगाई और जीवनयापन की लागत भी बढ़ने की आशंका है।