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लंदन में संत संसद के दूसरे दिन शिक्षा और संस्कार पर मंथन, संतों ने कहा- संस्कारयुक्त शिक्षा से ही समाज को मिलेगी सही दिशा

लंदन: विदेशी धरती पर पहली बार आयोजित संत संसद के दूसरे दिन ईस्ट लंदन के कॉलियर रोड, रोमफोर्ड स्थित द पवेलियन में संतों ने ‘शिक्षा और संस्कार’ विषय पर विचार-मंथन किया। संत संसद का आयोजन सचखंड नानक धाम डडली दरबार, सिद्धाश्रम और नेटवर्क 10 की ओर से किया जा रहा है।

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संत संसद की अध्यक्षता सचखंड नानक धाम लोनी के हजूर महाराज त्रिलोचन दास ने की। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि सिद्धपीठ श्री दूधेश्वर नाथ मठ महादेव मंदिर के पीठाधीश्वर, श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा के अंतरराष्ट्रीय प्रवक्ता, दिल्ली संत महामंडल के अध्यक्ष, जूना अखाड़ा की 13 मढ़ी के अध्यक्ष और हिंदू यूनाइटेड फ्रंट के अध्यक्ष श्रीमहंत नारायण गिरि महाराज सहित विश्वभर से आए संतों ने हिस्सा लिया। संतों ने कहा कि शिक्षा और संस्कार एक-दूसरे के पूरक हैं। संस्कारयुक्त शिक्षा ही व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण करने के साथ परिवार, समाज और राष्ट्र को सही दिशा दे सकती है।

शिक्षा और संस्कार जीवन का आधार: श्रीमहंत नारायण गिरि महाराज

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श्रीमहंत नारायण गिरि महाराज ने कहा कि बच्चे की पहली शिक्षक उसकी मां होती है, जिससे वह जीवन की शुरुआती बातें सीखता है। अनुशासन का पाठ वह अपने पिता से सीखता है और इसके बाद गुरु उसे शिक्षा के साथ संस्कार देने का कार्य करते हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षा और संस्कार हमारे जीवन का आधार हैं और दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। शिक्षा व्यक्ति के जीवन की दिशा और दशा बदलने वाला अनमोल उपहार है, जबकि संस्कार उसके व्यक्तित्व के निर्माण और विकास का आधार हैं।

उन्होंने कहा कि बच्चों में शिक्षा और संस्कार दोनों का विकास होगा, तभी परिवार, समाज, देश और विश्व का विकास संभव है। बच्चों को संस्कारयुक्त शिक्षा देने के लिए माता-पिता, शिक्षकों और संतों को आगे आना होगा। इसके साथ ही प्राचीन गुरुकुल शिक्षा पद्धति को विश्व स्तर पर पुनर्स्थापित करने की जरूरत है।

संतों की कृपा से ज्ञान और संस्कार मिलते हैं: हजूर महाराज त्रिलोचन दास

संत संसद के अध्यक्ष हजूर महाराज त्रिलोचन दास ने कहा कि संतों पर भगवान की कृपा होती है और उनके सानिध्य से व्यक्ति को ज्ञान और संस्कार प्राप्त होते हैं। उन्होंने कहा कि संतों की कृपा मिलने से जीवन में सकारात्मक बदलाव आता है।

ज्ञान, कर्म और श्रद्धा से आएगा जीवन में बदलाव: राजेश्वर गुरु महाराज

संत संसद के आयोजक सिद्ध आश्रम के राजेश्वर गुरु महाराज ने कहा कि समाज में बदलाव के लिए व्यक्ति के भीतर अच्छे गुणों का होना जरूरी है और इसकी नींव बचपन में ही रखी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि बच्चों में ज्ञान, कर्म और श्रद्धा जैसे तीन गुण विकसित करने की जरूरत है। इन तीनों गुणों को जीवन में अपनाने से व्यक्ति और समाज में सकारात्मक बदलाव आएगा।

संस्कारयुक्त शिक्षा ही पूर्ण शिक्षा: जगतगुरु चक्रपाणि नंद गिरि महाराज

जगतगुरु चक्रपाणि नंद गिरि महाराज ने कहा कि शिक्षा और संस्कार को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। शिक्षा में जब संस्कार जुड़ते हैं, तभी वह पूर्ण होती है। उन्होंने कहा कि संस्कारयुक्त शिक्षा गुरुजनों के सानिध्य से ही प्राप्त हो सकती है।

महामनीषी निरंजन स्वामी ने कहा कि जब तक शिक्षा को आध्यात्म से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक उसका उद्देश्य अधूरा रहेगा। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में आध्यात्मिक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए गुरुकुल शिक्षा पद्धति को फिर से मजबूत करने की आवश्यकता है। पांडुरकार सरकार ने कहा कि आने वाला समय आध्यात्म का है, इसलिए शिक्षा को आध्यात्म से जोड़ना जरूरी है। बच्चों में संस्कार विकसित करने की जिम्मेदारी माता-पिता और गुरुजनों की है।

पद्मश्री सद्गुरु ब्रह्मेश्वरानंद आचार्य ने कहा कि बच्चों को महापुरुषों के जीवन से शिक्षा और संस्कार ग्रहण करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। ऐसी शिक्षा जरूरी है जो बच्चों को जीवन में पुरुषार्थी बनाए और समाज में शांति स्थापित करने में योगदान दे। महामंडलेश्वर स्वामी डॉ. उमाकांतानंद गिरि महाराज ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री हासिल करना या रोजगार प्राप्त करना नहीं होना चाहिए। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए, जो व्यक्ति को संस्कारवान और चरित्रवान बनाए।

महामंडलेश्वर भूपेंद्र गिरि महाराज ने कहा कि जो शिक्षा इंसान को बेहतर इंसान बनाए और उसके भीतर ज्ञान, संस्कार और चरित्र का विकास करे, वही वास्तविक शिक्षा है। महामंडलेश्वर स्वामी यतेंद्रानंद गिरि महाराज ने कहा कि व्यक्ति का व्यक्तित्व उसके चिंतन से बनता है और चिंतन का आधार संस्कार है। संस्कार की नींव शिक्षा से पड़ती है। उन्होंने कहा कि बच्चों को ऐसी शिक्षा और संगत मिलनी चाहिए, जो उन्हें सकारात्मक सोच और अच्छे कार्यों की ओर ले जाए।

बटुकेश्वर गिरि महाराज ने कहा कि बच्चे को शिक्षित और संस्कारित करने की पहली जिम्मेदारी मां की होती है। इसलिए मां को बचपन से ही बच्चों में अच्छे संस्कार विकसित करने पर ध्यान देना चाहिए। महंत ऋषिश्वरानंद गिरि महाराज ने कहा कि बच्चों में भारतीय संस्कृति, परंपराओं, भाईचारे और एकता के संस्कार बचपन से ही विकसित किए जाने चाहिए। इससे उनमें भारतीय मूल्यों और संस्कारों की नींव मजबूत होगी। संत संसद के दूसरे दिन हुए इस मंथन में संतों ने एक स्वर में कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि अच्छे संस्कार, चरित्र और जिम्मेदारी की भावना विकसित करना भी होना चाहिए।