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ईरान जंग की वजह से मिडिल ईस्ट में 41 लाख लोग हुए विस्थापित

अमेरिका और इजराइल के लगातार हवाई हमलों के बीच ईरान में मानवीय संकट तेजी से गहराता जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) के अनुसार युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक करीब 41 लाख लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हो चुके हैं, जिनमें बड़ी संख्या तेहरान और अन्य बड़े शहरों से सुरक्षित इलाकों की ओर पलायन कर रही है। एजेंसी ने चेतावनी दी है कि यदि हमले जारी रहे तो विस्थापन का यह आंकड़ा और तेजी से बढ़ सकता है।

UNHCR के अनुसार यह संख्या करीब 6 लाख से 10 लाख ईरानी परिवारों के बराबर है। अधिकांश लोग तेहरान और अन्य बड़े शहरी इलाकों से निकलकर देश के उत्तरी हिस्सों और ग्रामीण क्षेत्रों की ओर जा रहे हैं, जहां वे अपेक्षाकृत सुरक्षित माहौल की तलाश कर रहे हैं। अगर युद्ध जारी रहता है तो विस्थापन का आंकड़ा और बढ़ सकता है, जिससे मानवीय जरूरतों में चिंताजनक वृद्धि होगी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्धविराम और तनाव कम करने की अपीलों के बावजूद अमेरिका और इजराइल की सेनाएं ईरान में हमले जारी रखे हुए हैं।

बृहस्पतिवार को राजधानी तेहरान समेत कई शहरों में जोरदार विस्फोटों की आवाजें सुनी गईं। पूर्वी तेहरान के एक प्रभावित इलाके में कई बहुमंजिला इमारतें बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गईं। बचावकर्मी मलबे में दबे लोगों को निकालने के लिए लगातार राहत कार्य चला रहे हैं। ईरान ने भी अमेरिका-इजराइल हमलों के जवाब में मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य ठिकानों और अन्य लक्ष्यों पर मिसाइलों और ड्रोन से हमले किए हैं। इसके साथ ही ईरान ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया है, जो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग माना जाता है। इस जलमार्ग से दुनिया के कुल तेल परिवहन का लगभग एक-पांचवां हिस्सा गुजरता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह मार्ग लंबे समय तक बंद रहता है तो वैश्विक तेल आपूर्ति और ऊर्जा बाजार पर गंभीर असर पड़ सकता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक और रणनीतिक तनाव और बढ़ने की आशंका है।

ईरान के उप स्वास्थ्य मंत्री अली जाफरियान ने बातचीत में कहा कि हाल के दिनों में शहरी इलाकों पर हमलों के तेज होने के कारण घायलों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि घायल होने वालों में अधिकांश आम नागरिक हैं। जाफरियान के मुताबिक हमलों में 30 से अधिक अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्र क्षतिग्रस्त हो चुके हैं, जिससे चिकित्सा सेवाओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।