पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच 170 भारतीय नागरिक ईरान से जमीन के रास्ते आर्मेनिया पहुंच गए हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने बताया कि इन भारतीयों में से कई लोग भारत लौट चुके हैं, जबकि बाकी लोग आने वाले दिनों में आर्मेनिया से भारत के लिए उपलब्ध कमर्शियल फ्लाइट्स से वापस आएंगे। जायसवाल ने कहा कि तेहरान स्थित भारतीय दूतावास उन भारतीय नागरिकों की मदद कर रहा है जो ईरान छोड़ना चाहते हैं। इसके तहत उन्हें जमीन के रास्ते आर्मेनिया और अजरबैजान तक पहुंचने में सहायता दी जा रही है, जहां से वे हवाई मार्ग से भारत लौट सकते हैं।
उन्होंने बताया कि 4 मार्च को विदेश मंत्रालय में कंट्रोल रूम स्थापित किए जाने के बाद से अब तक करीब 900 फोन कॉल और 200 ईमेल प्राप्त हुए हैं। हालांकि अब लोगों की चिंताएं कुछ कम हुई हैं और पूछताछ की संख्या भी घट रही है। जायसवाल ने कहा कि मंत्रालय जरूरतमंद लोगों को रियल टाइम सहायता दे रहा है और उन्हें क्षेत्र में मौजूद भारतीय दूतावासों से जोड़कर उनकी समस्याओं का समाधान कर रहा है। इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से फोन पर बात की। इस दौरान प्रधानमंत्री ने क्षेत्र में बढ़ते तनाव और आम नागरिकों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई।
प्रधानमंत्री ने कहा कि भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और ऊर्जा तथा माल ढुलाई की निर्बाध आपूर्ति भारत की प्राथमिकता है। उन्होंने तनाव कम करने के लिए संवाद और कूटनीति का रास्ता अपनाने पर जोर दिया। वहीं विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची से बातचीत की। दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों और ब्रिक्स (BRICS) से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की।
ईरान के विदेश मंत्रालय के अनुसार अराघची ने जयशंकर को क्षेत्र की ताजा स्थिति से अवगत कराया और कहा कि ईरान अपनी आत्मरक्षा के अधिकार का इस्तेमाल करने के लिए दृढ़ है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका और इजराइल के सैन्य हमलों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निंदा होनी चाहिए और ब्रिक्स जैसे मंचों को क्षेत्रीय व वैश्विक स्थिरता बनाए रखने में रचनात्मक भूमिका निभानी चाहिए।
गौरतलब है कि 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल के संयुक्त सैन्य हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद पश्चिम एशिया में तनाव काफी बढ़ गया है। इसके जवाब में ईरान ने खाड़ी क्षेत्र के कई देशों में अमेरिकी और इजराइली ठिकानों को निशाना बनाया, जिससे समुद्री रास्तों और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर असर पड़ा है।