जम्मू, पांच सितंबर (भाषा) विस्थापित कश्मीरी पंडितों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन पनुन कश्मीर ने शनिवार को एक-दिवसीय भूख हड़ताल की। इस दौरान उन्होंने समुदाय के साथ हुए 'नरसंहार' को औपचारिक मान्यता देने, एक नरसंहार-रोधी कानून बनाने और कश्मीर घाटी में विस्थापित पंडितों के पुनर्वास के लिए एक अलग ‘होमलैंड’ बनाने की मांग की।
संगठन ने जम्मू प्रेस क्लब के निकट प्रदर्शन किया।
इससे पहले संगठन ने 20 जुलाई को दिल्ली में भी प्रदर्शन किया था।
यह कश्मीरी पंडितों के 1990 के पलायन को लेकर न्याय और जवाबदेही की मांग के लिए चलाए जा रहे व्यापक अभियान का हिस्सा था।
पनुन कश्मीर के अध्यक्ष टिटो गंजू ने कहा कि समुदाय पिछले 37 वर्षों से कथित नरसंहार को आधिकारिक मान्यता दिए जाने की मांग कर रहा है। उन्होंने कहा, ‘‘हमने नरसंहार झेला है और हम चाहते हैं कि इसे आधिकारिक रूप से मान्यता दी जाए।’’
गंजू ने दावा किया कि संसद में इस शब्द का उल्लेख किया गया है, लेकिन सरकार की ओर से अब तक इसे औपचारिक मान्यता नहीं दी गई है।
उन्होंने अलग से नरसंहार-रोधी कानून बनाए जाने की भी मांग की।
गंजू ने कहा कि नरसंहार रोकथाम समझौते के हस्ताक्षरकर्ता देश के रूप में भारत इस तरह का कानून बनाने के लिए बाध्य है।
उन्होंने कहा कि पनुन कश्मीर ने वर्ष 2020 में खुद एक विधेयक का प्रस्ताव रखा था और वह चाहता है कि सरकार इस मुद्दे की जांच व कानून बनाने पर विचार-विमर्श के लिए एक आयोग का गठन करे।
गंजू ने कहा, ‘‘सैंतीस साल बाद भी पीड़ित समुदाय को न्याय और आजीविका के लिए प्रदर्शन करना पड़ रहा है।’’
उन्होंने संगठन की तीन प्रमुख मांगों को गिनाते हुए कहा कि इनमें ‘नरसंहार को मान्यता देना, नरसंहार-रोधी कानून का निर्माण और अलग होमलैंड’ शामिल हैं।
पनुन कश्मीर ने केंद्र सरकार से बेरोजगार कश्मीरी पंडित युवाओं के लिए 15,000 नौकरियां देने और विस्थापित परिवारों को मिलने वाली मासिक आर्थिक सहायता बढ़ाकर कम से कम 25,000 रुपये करने की भी मांग की।
भाषा जितेंद्र सुरेश
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