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वैज्ञानिकों ने मलेरिया परजीवियों के दवा रोधी बनने की नयी प्रक्रिया का पता लगाया

तिरुवनंतपुरम, 17 जून (भाषा) केरल की राजधानी स्थित ब्रिक-आरजीसीबी के वैज्ञानिकों ने एक बड़ी कामयाबी हासिल करते हुए एक उस प्रक्रिया का पता लगा लिया है, जिससे मलेरिया के परजीवी दुनिया की सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली मलेरिया रोधी दवा ‘आर्टेमिसिनिन’ के असर से बच जाते हैं।

क्रिस्टीन डेविस और उनके साथियों द्वारा किये गए अध्ययन को ‘द जर्नल ऑफ इंफेक्शियस डिजीजेज’नामक पत्रिका के ‘संपादक की पसंद’ श्रेणी में प्रकाशित किया गया है जिसके मुताबिक नयी लाल रक्त कोशिकाएं (जिन्हें रेटिकुलोसाइट्स कहा जाता है) एक सुरक्षात्मक बायोकेमिकल माहौल बनाती हैं। यह माहौल मलेरिया परजीवियों को दवा से होने वाले तनाव का सामना करने में मदद करता है।

यह अध्ययन उस आम धारणा को चुनौती देता है कि आर्टेमिसिनिन के प्रति प्रतिरोध मुख्य रूप से परजीवी के भीतर होने वाले आनुवांशिकी बदलावों की वजह से होता है।

बुधवार को यहां जारी एक बयान के मुताबिक पूर्व की धारणा के विपरीत यह अध्ययन इंगित करता है कि मेजबान कोशिश खुद इलाज के नतीजों पर काफी असर डाल सकती हैं।

बायोटेक्नोलॉजी रिसर्च एंड इनोवेशन काउंसिल (ब्रिक) के तहत आने वाले राजीव गांधी सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी में यह अध्ययन भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (आर्इआईएसईआर) तिरुवनंतपुरम, कॉस्मोपॉलिटन हॉस्पिटल (तिरुवनंतपुरम) और पुणे स्थित वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद- राष्ट्रीय रासायनिक प्रयोगशाला (सीएसआईआर-एनसीएल) के वैज्ञानिकों के सहयोग से किया गया है।

आरजीसीबी के प्राचार्य अनुसंधानकर्ता और अनुसंधानपत्र के वरिष्ठ लेखक डॉ. राजेश चंद्रमोहनदास ने कहा, ‘‘हमारे अध्ययन से जानकारी मिलती है कि मेजबान कोशिश की जैविकी इस बात पर काफी असर डाल सकती है कि मलेरिया परजीवी इलाज के प्रति कैसी प्रतिक्रिया देते हैं।’’

उन्होंने कहा, ‘‘यह परजीवी अकेले काम नहीं करता। यह दवा से होने वाले तनाव से खुद को बचाने के लिए नयी रक्त कोशिकाओं में मौजूद प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट सुरक्षा तंत्र का इस्तेमाल करता है।’’

उन्होंने कहा कि यह अध्ययन खास तौर पर बच्चों, एनीमिया के मरीजों और खून की कमी या संक्रमण से उबर रहे लोगों के लिए अहम है, क्योंकि इन सभी के रक्त में अकसर ‘रेटिकुलोसाइट्स’ का स्तर बढ़ा हुआ होता है।

अध्ययन के मुताबिक ऐसी स्थितियों में इलाज के दौरान परजीवी के जिंदा रहने के लिए ज्यादा अनुकूल माहौल बन सकता है।

मलेरिया के परजीवी इंसानों की लाल रक्त कोशिकाओं के अंदर रहते हैं और प्रजन्न करते हैं।

पूर्व के अध्ययनों में परजीवी में होने वाले उन आनुवांशिकी बदलावों पर ध्यान दिया गया, जिनसे दवा के प्रति प्रतिरोध पैदा होता है, लेकिन नए अध्ययन से संकेत मिलता है कि इलाज के नतीजों को तय करने में मेजबान कोशिका भी अहम भूमिका निभा सकती हैं।

वैज्ञानिकों के मुताबिक बेहद शुद्ध इंसानी रेटिकुलोसाइट्स और उन्नत विश्लेषण का इस्तेमाल कर किये गए अध्ययन में पाया गया कि इन अपरिपक्व रक्त कोशिकाओं में भरपूर मात्रा में पोषण तत्व, एंटीऑक्सीडेंट और सुरक्षात्मक एंजाइम होते हैं।

अनुसंधान पत्र के मुताबिक मलेरिया के परजीवी जब रेटिकुलोसाइट्स को संक्रमित करते हैं, तो उन्हें यह सुरक्षात्मक माहौल मिल जाता है, जिससे वे तेजी से बढ़ पाते हैं और आर्टेमिसिनिन इलाज से उनपर पड़ने वाले दुष्प्रभाव का बेहतर तरीके से सामना कर सकते हैं।

टीम ने देखा कि परिपक्व लाल रक्त कोशिकाओं में पनपने वाले परजीवी की तुलना में, रेटिकुलोसाइट्स के अंदर पनपने वाले परजीवी आर्टेमिसिनिन और उससे जुड़े यौगिक से काफी कम प्रभावित होते थे।

खास बात यह है कि जब परजीवी को वापस परिपक्व कोशिकाओं के साथ संलग्न किया तो यह सुरक्षात्मक असर खत्म हो गया। इससे पता चलता है कि यह घटना परजीवी में स्थायी आनुवांशिकी बदलावों के बजाय मेजबान कोशिश के माहौल की वजह से होती है।

ब्रिक-आरजीसीबी की निदेशक डॉ. बीना पिल्लई ने कहा, ‘‘ये अहम नतीजे यह समझने में मदद करेंगे कि कुछ मलेरिया संक्रमणों में इलाज के बावजूद ठीक होने में देरी क्यों होती है या वे क्यों बने रहते हैं, जबकि उनमें दवा-प्रतिरोध के ज्ञात आनुवांशिकी लक्षण नहीं दिखाई देते।’’

भाषा धीरज माधव

माधव