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‘सब कुछ धूल में मिल गया’: साकेत हादसे में बचे लोगों ने याद किया भयावह मंजर

(श्रुति भारद्वाज)

नयी दिल्ली, 31 मई (भाषा) एक पल पहले छात्र रात का खाना खा रहे थे, नोट्स दोहरा रहे थे और आगामी परीक्षाओं के बारे में चर्चा कर रहे थे; अगले ही पल, वे अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे थे क्योंकि कान फाड़ देने वाली गर्जना के साथ उनकी इमारत ढह गयी और धूल का गुबार पूरे इलाके में छा गया।

शनिवार शाम करीब 7:44 बजे साकेत मेट्रो स्टेशन के पास पांच मंजिला व्यावसायिक इमारत के ढहने की घटना में बच गए छात्रों और कार्यालय कर्मचारियों के लिए, वह मंजर उनके दिमाग में हमेशा के लिए अंकित हो गया है।

अधिकारियों ने बताया कि इस घटना में छह लोगों की मौत हो गई और कई अन्य लोगों को अस्पताल में भर्ती कराया गया। बचाव अभियान रविवार को जारी रहा।

इमारत से सटी कैंटीन के पास मौजूद छात्र रोनित ने कहा, “ऐसा लगा जैसे पूरा इलाका अचानक गायब हो गया हो।” मेडिकल परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्र रोनित ने कहा, “मैंने इमारत का एक हिस्सा गिरते हुए देखा और समझ गया कि ढांचा ढहने ही वाला है। एक ज़ोरदार आवाज़ हुई और देखते ही देखते चारों ओर धूल ही धूल हो गई। हम देख नहीं पा रहे थे कि कौन कहां खड़ा है। लोग चीखते-चिल्लाते इधर-उधर भाग रहे थे।”

सैद-उल-अजैब क्षेत्र के वेस्टएंड मार्ग पर स्थित इमारत में कोचिंग संस्थान, कैफे, कार्यालय आदि थे। ढही हुई इमारत के बगल में एक छोटी कैंटीन थी, जहां विदेशी मेडिकल स्नातक, नीट और गेट जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्र अक्सर आते थे।

इनमें से कई छात्र पास के ही पेइंग गेस्ट आवासों में रहते हैं और भोजन और चाय के लिए कैंटीन में इकट्ठा होने से पहले पुस्तकालयों और कोचिंग केंद्रों में लंबा समय बिताते हैं।

जब इमारत गिरी, तो उसका मलबा टिन की छत वाली कैंटीन पर जा गिरा, जिससे कई लोग उसके नीचे दब गए। कैंटीन में नियमित रूप से आने वाले ऋषभ ने कहा, “हमने अजीब सी आवाज सुनी, और फिर अचानक अफरा-तफरी मच गई। कुछ लोग भागने की कोशिश में गिर पड़े, जबकि अन्य अपने दोस्तों को पुकार रहे थे। मेरी आंखें जल रही थीं, और लोग खड़े होने के लिए सुरक्षित जगह ढूंढने की कोशिश कर रहे थे।”

इसके बाद का मंजर भी उतना ही भयावह था।

बच निकलने वाले छात्र अपने सहपाठियों, सहकर्मियों और कैंटीन की मालकिन पार्वती ओझा की तलाश में मलबे के पास लौटे। पार्वती ओझा कथित तौर पर छात्रों को चेतावनी देने के लिए वापस गई थीं, लेकिन बाद में मलबे में दबकर उनकी मृत्यु हो गई।

ऋषभ ने कहा, “लोग एक-दूसरे का नाम पुकार रहे थे और यह देखने के लिए फोन चेक कर रहे थे कि कौन सुरक्षित है।”

जीवित बचे लोगों में आशुतोष भी शामिल है। उन्होंने शुरू में सोचा कि कंपन सामान्य बात है। उन्होंने कहा, “पास में एक मेट्रो स्टेशन है, और हम अक्सर इस इलाके में हल्के झटके महसूस करते हैं।” उन्होंने कहा, “जब कैंटीन की इमारत हिलने लगी, तो हममें से कई लोगों ने इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। लेकिन कुछ ही क्षणों में कंपन तेज हो गया और फिर सब कुछ ढह गया।”

मलबे की चपेट में आने से आशुतोष के पैर और कंधे में चोटें आईं।

उन्होंने बताया, “मैंने दूर हटने की कोशिश की, लेकिन कंक्रीट के कुछ टुकड़े मेरे ऊपर गिरे। फिर रेंगते हुए मैं किसी तरह बाहर निकल पाया।”

भाषा प्रशांत अविनाश

अविनाश