Breaking News

हिमाचल: चंबा में टैक्सी खाई में गिरी, 8 टूरिस्ट्स की मौत     |   कोलकाता: ममता बनर्जी TMC नेताओं पर हुए हमले के विरोध में 2 जून को प्रदर्शन करेंगी     |   पश्चिम बंगाल: शुभेंदु कैबिनेट में कल 35 मंत्री शपथ लेंगे     |   पीएम आवास पर BJP केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक जारी, राज्यसभा चुनाव के उम्मीदवारों पर चर्चा     |   लखनऊ मेट्रो में लागू हुई ‘वन नेशन, वन कार्ड’ व्यवस्था, 15 जून से जारी होंगे नए NCMC     |  

सोनारपुर हमला अभिषेक बनर्जी के राजनीतिक करियर के लिए महत्वपूर्ण मोड़ : राजनीतिक विश्लेषक

(सौगत मुखोपाध्याय)

कोलकाता, 31 मई (भाषा) विश्लेषकों का कहना है कि तृणमूल कांग्रेस महासचिव अभिषेक बनर्जी पर सोनारपुर में हुआ हमला उनके राजनीतिक करियर का निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है, जिससे यह तय होगा कि उन्हें सिर्फ एक राजनीतिक विरासत का उत्तराधिकारी माना जाएगा या वह अपने दम पर जन नेता के रूप में उभरेंगे।

अपने अब तक के राजनीतिक करियर के दौरान, अभिषेक बनर्जी ने सत्तारूढ़ दल के नेता के तौर पर काम किया है, क्योंकि उनकी बुआ एवं तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी, हाल तक पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री थीं। अभिषेक को पार्टी में दूसरे सबसे बड़े नेता के रूप में देखा जाता है।

उन्होंने इससे पहले कभी विपक्षी नेता की तरह जन विरोध का सामना नहीं किया था। पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के सोनारपुर कस्बे में शनिवार दोपहर को यह स्थिति बदल गई, जब लोगों ने डायमंड हार्बर सांसद पर पथराव किया और अंडे फेंके।

विश्लेषकों का कहना है कि ममता बनर्जी के विपरीत, जिनकी राजनीतिक पहचान विपक्ष की राजनीति की कसौटी पर गढ़ी गई थी, अभिषेक बनर्जी ने काफी हद तक सत्ताधारी पार्टी के ‘‘सुरक्षात्मक आवरण’’ के भीतर काम किया है।

उन्होंने कहा कि चाहे कांग्रेस में अपने कार्यकाल के दौरान या बाद में वाम-विरोधी आंदोलन के चेहरे के रूप में, ममता ने राजनीतिक हमलों को सहकर और उन्हें जन सहानुभूति में परिवर्तित कर अपनी छवि बनाई। सड़कों पर वर्षों के संघर्ष के माध्यम से वह लोकप्रिय नेता के रूप में उभरीं।

विश्लेषकों के मुताबिक, अभिषेक बनर्जी की राजनीतिक यात्रा काफी अलग रही है। शायद बदलते हालात का एकमात्र संकेत मई 2023 में झाड़ग्राम जिले में कुडमी आंदोलन के दौरान सामने आया, जब प्रदर्शनकारियों ने उनके काफिले को रोक दिया और उन्हें उस आक्रोश का सामना करना पड़ा जिसे संगठनात्मक ताकत या प्रशासनिक अधिकार से नियंत्रित नहीं किया जा सकता था।

नेता द्वारा उस आक्रोश को नजरअंदाज करने का परिणाम तब दिखा जब 2026 के विधानसभा चुनावों में कुडमी बहुल जिले में टीएमसी को चारों सीटों पर करारी हार का सामना करना पड़ा।

सोनारपुर की घटना को लेकर राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह अनुभव परिवर्तनकारी साबित हो सकता है।

टीएमसी के पूर्व सांसद जवाहर सरकार ने कहा, ‘‘अभिषेक बनर्जी के लिए यह वास्तविकता और कठिनाइयों का पहला अनुभव है, जिनसे ममता बनर्जी 1980 से जूझ रही हैं।’’

राज्यसभा के पूर्व सदस्य ने कहा, ‘‘अब अभिषेक बनर्जी ने जनता के आक्रोश का सामना किया है, चाहे वह स्वतःस्फूर्त हो या पूर्वनियोजित। यह उनकी अग्नि परीक्षा है, चाहे यह कितनी भी छोटी घटना क्यों न हो। देखते हैं कि वह इस संबंध में कैसे आगे बढ़ते हैं।’’

अभिषेक पर अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि उनकी सत्ता मुख्य रूप से विरासत से प्राप्त हुई है, न कि संघर्ष से। सोनारपुर जैसी घटनाएं उन्हें इस धारणा को चुनौती देने का अवसर प्रदान करती हैं।

राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर मैदुल इस्लाम ने कहा, ‘‘अगर वह लचीलापन प्रदर्शित कर सकते हैं, विरोधी निर्वाचन क्षेत्रों के साथ जुड़ाव जारी रख सकते हैं और राजनीतिक जोखिमों को उठाने की तत्परता दिखा सकते हैं, तो वह ऐसा गुण हासिल कर सकते हैं जो विरासत में नहीं मिल सकता और वह है आम जनमानस में जगह बनाना।’’

उन्होंने कहा कि अभिषेक बनर्जी के लिए खतरा यह है कि यह घटना एक व्यापक राजनीतिक परिवर्तन की शुरुआत के बजाय एक सामान्य घटना बनकर रह जाए।

इस्लाम ने कहा, ‘‘हमले का शिकार होने वाले नेता और हमले के बाद और भी मजबूत होकर उभरने वाले नेता के बीच का अंतर इस बात में निहित है कि वे बाद में किस तरह प्रभावी ढंग से विमर्श को आकार देते हैं।’’

भाषा शफीक अविनाश

अविनाश