नयी दिल्ली, 15 अप्रैल (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्र से यह स्पष्ट करने को कहा है कि संशोधित उभयलिंगी कानून के बाद शैक्षणिक अभिलेखों में उभयलिंगी व्यक्तियों के नाम किस प्रकार प्रकाशित किए जाने चाहिए।
न्यायमूर्ति प्रतिभा एम सिंह और न्यायमूर्ति मधु जैन की पीठ ने उभयलिंगी व्यक्तियों से संबंधित मुद्दों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। इन मुद्दों में दिल्ली विश्वविद्यालय और केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) द्वारा जारी प्रमाणपत्रों और रखे गए अभिलेखों में उनकी पहचान किस प्रकार दर्ज की जाती है, यह भी शामिल था।
पीठ ने टिप्पणी की कि इस मामले में जारी किए गए निर्देश अन्य आधिकारिक दस्तावेजों, जैसे जन्म प्रमाण पत्र, मृत्यु प्रमाण पत्र, पासपोर्ट, आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस और अन्य आधिकारिक दस्तावेजों के जारी करने पर भी लागू हो सकते हैं और केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय को सुनवाई में एक पक्षकार बनाया।
अदालत ने नौ अप्रैल को पारित आदेश में कहा, ‘‘उपरोक्त को ध्यान में रखते हुए, न्यायालय का मत है कि इन मामलों में भारत संघ का पक्ष सुनना आवश्यक होगा। तदनुसार सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय (एमओएसजेई) के सचिव को तीनों याचिकाओं में प्रतिवादी संख्या 4 के रूप में शामिल किया जाता है।’’
इसमें कहा गया है, ‘‘इन सभी मामलों में एमओएसजेई छह सप्ताह की अवधि के भीतर हलफनामे के माध्यम से अपना पक्ष प्रस्तुत करे।’’
अदालत ने केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए वकीलों को मंत्रालय से निर्देश लेने को कहा।
सीबीएसई के वकील ने कहा कि उभयलिंगी व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 के बाद, ‘‘उभयलिंगी व्यक्ति’’ की परिभाषा को अद्यतन किया गया है।
अदालत ने मामले की अगली सुनवाई की तिथि 15 जुलाई तय की।
वर्ष 2017 और 2019 में दायर की गई याचिकाओं में उभयलिंगी व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 के प्रावधानों के तहत अधिकारों के कार्यान्वयन के लिए निर्देश देने का अनुरोध किया गया है।
भाषा
देवेंद्र नरेश
नरेश