रायपुर, 15 अप्रैल (भाषा) छत्तीसगढ़ मंत्रिपरिषद ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने के संबंध में उसका प्रारूप तैयार करने के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में एक समिति का गठन करने का निर्णय लिया है। अधिकारियों ने बुधवार को यह जानकारी दी।
अधिकारियों ने बताया कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की अध्यक्षता में आज यहां मंत्रिपरिषद ने अपनी एक बैठक में यह निर्णय लिया।
उन्होंने बताया कि मंत्रिपरिषद ने समिति के सदस्यों के मनोनयन के लिए मुख्यमंत्री को अधिकृत किया है।
अधिकारियों ने बताया कि छत्तीसगढ़ में फिलहाल विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, दत्तक ग्रहण, भरण-पोषण एवं पारिवारिक मामलों से संबंधित विवादों में विभिन्न धर्मों के अनुसार अलग-अलग ‘पर्सनल लॉ’ लागू हैं।
उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत राज्य को सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने का निर्देश दिया गया है लेकिन अलग-अलग कानूनों के कारण वैधानिक प्रक्रिया में असमानता उत्पन्न होती है, जिससे न्याय प्रक्रिया जटिल होती है, ऐसे में कानून को सरल, एकरूप और न्यायसंगत बनाने के लिए समान नागरिक संहिता लागू करना आवश्यक माना जा रहा है, जिससे धार्मिक और लैंगिक समानता को भी बढ़ावा मिलेगा।
उन्होंने बताया कि इसी दिशा में छत्तीसगढ़ में एक उच्चस्तरीय समिति गठित करने का निर्णय लिया गया है, जो राज्य के नागरिकों, संगठनों तथा विशेषज्ञों से व्यापक सुझाव लेकर समान नागरिक संहिता का प्रारूप तैयार करेगी।
अधिकारियों ने कहा कि समिति की सिफारिशों के आधार पर तैयार प्रारूप को विधिसम्मत प्रक्रिया के तहत मंत्रिपरिषद से अनुमोदन के बाद विधानसभा में प्रस्तुत किया जाएगा, जिससे राज्य में एक समान और पारदर्शी नागरिक कानून व्यवस्था स्थापित हो सके।
मुख्यमंत्री साय ने यहां संवाददाताओं से बातचीत के दौरान कहा कि यह समिति प्रारूप तैयार करने से पहले समाज के सभी वर्गों और विभिन्न संगठनों के वरिष्ठ प्रतिनिधियों से परामर्श करेगी कि राज्य में यूसीसी को कैसे लागू किया जा सकता है।
हालांकि, विपक्षी दल कांग्रेस ने इस कदम की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी आदिवासी समुदायों के अधिकारों को कमजोर करने की कोशिश कर रही है।
कांग्रेस की प्रदेश इकाई के अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा, ‘‘यदि छत्तीसगढ़ में यूसीसी लागू होता तो सबसे बड़ा नुकसान छत्तीसगढ़ के आदिवासियों को होगा। यूसीसी छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के खिलाफ है, राज्य में केवल आदिवासी ही ऐसे है जिन्हें प्रदेश में निवासरत अन्य लोगों की अपेक्षा विशेष संवैधानिक संरक्षण मिला हुआ है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘छत्तीसगढ़ में 32 प्रतिशत से अधिक आबादी आदिवासियों की है, संरक्षित जनजातियां है, जिन्हें संविधान में कुछ विशेष अधिकार मिले है। उनकी रक्षा के लिए पेसा (पंचायत उपबंध - अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) कानून लागू है और पाचवीं अनुसूची लागू है। भाजपा यूसीसी लाकर आदिवासियों के हितों में डकैती डालने की कोशिश में है।’’
आदिवासी समाज से आने वाले बैज ने सवाल किया कि राज्य की संरक्षित जनजातियां बैगा, कमार, पहाड़ी, कोरवा, बिरहोर, अबुझमाड़िया, भुंजिया, पांडा को संविधान में विशेष संरक्षण मिला है क्या यूसीसी लागू होने पर इनके अधिकार सुरक्षित रहेंगे?
भाषा संजीव खारी
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