नयी दिल्ली, 15 अप्रैल (भाषा) धर्म से जुड़े मामलों में जनहित याचिकाओं (पीआईएल) की विचारणीयता पर गौर करते हुए, बुधवार को उच्चतम न्यायालय ने कहा कि किसी अदालत के लिए यह घोषित करना सबसे कठिन कार्यों में से एक है कि लाखों लोगों की आस्था गलत या त्रुटिपूर्ण है।
वहीं त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (टीडीबी) ने दलील दी कि जनहित याचिकाओं को धार्मिक प्रथाओं की व्याख्या करने का ‘‘माध्यम’’ बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
नौ न्यायाधीशों की यह पीठ धार्मिक स्थलों, जिनमें शबरिमला मंदिर भी शामिल है, में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। साथ ही, विभिन्न धर्मों द्वारा अपनाई जाने वाली धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे और विस्तार पर भी विचार कर रही है।
केरल के ऐतिहासिक शबरिमला मंदिर का प्रबंधन करने वाले टीडीबी की ओर से अदालत में पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष दलील दी कि जनहित याचिका को किसी धार्मिक प्रथा या उसके उल्लंघन की व्याख्या करने का जरिया नहीं बनाया जाना चाहिए।
पीठ द्वारा निर्धारित प्रश्नों में से एक यह है कि क्या कोई व्यक्ति जो किसी धार्मिक संप्रदाय या समूह से संबंधित नहीं है, जनहित याचिका दायर करके उस संप्रदाय या समूह की किसी प्रथा पर सवाल उठा सकता है।
सिंघवी ने दलील दी कि धर्म से जुड़े मामलों में, न्यायालय की सर्वोपरि भूमिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर जनहित याचिकाओं को रोकना और हतोत्साहित करना होनी चाहिए।
सिंघवी की दलील का जवाब देते हुए, प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी की, ‘‘सबसे कठिन काम यह घोषणा करना है कि लाखों लोगों की आस्था गलत या त्रुटिपूर्ण है।’’
पीठ में न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना, न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले, न्यायमूर्ति आर. महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची भी शामिल हैं।
इस चर्चा में शामिल होते हुए न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि जब याचिकाकर्ता बाहरी व्यक्ति हो तो जनहित याचिकाओं पर विचार नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘‘हम सामाजिक कल्याण सुधारों के नाम पर धर्म को खोखला नहीं कर सकते।’’
न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश ने सवाल उठाया कि क्या अदालत किसी धार्मिक प्रथा पर लाखों श्रद्धालुओं की बात सुने बिना फैसला कर सकती है।
सिंघवी ने पीठ से कहा, ‘‘धर्म उन मान्यताओं और परंपराओं का समूह है, जिसका अनुसरण व्यापक रूप से समान पहचान वाले किसी समूह/पंथ/सम्प्रदाय द्वारा किया जाता है। हालांकि, अनुच्छेद 25 स्पष्ट रूप से किसी व्यक्ति को अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने का अधिकार प्रदान करता है, लेकिन ऐसे व्यक्तिगत अधिकारों को इस सीमा तक विस्तारित नहीं किया जा सकता कि वे उसी धर्म या सम्प्रदाय के अन्य सभी श्रद्धालुओं के व्यक्तिगत अधिकारों का अतिक्रमण करें।’’
सिंघवी ने पीठ के समक्ष दलील दी कि शबरिमला भगवान अय्यप्पा का एकमात्र मंदिर है जहां देवता की पूजा नैष्ठिक ब्रह्मचारी के रूप में की जाती है।
उन्होंने कहा, ‘‘मुझे बताया गया है कि भारत में भगवान अय्यप्पा के लगभग 1,000 मंदिर हैं। कोई 1,499 कहता है, कोई 1,000। चलिए इस पर बात न करें। भगवान अय्यप्पा का एकमात्र मंदिर, जिसमें उन्हें नैष्ठिक ब्रह्मचारी के रूप में देखा जाता है - नैष्ठिक शब्द का अर्थ है शाश्वत ब्रह्मचारी -शबरिमला मंदिर है।’’
सिंघवी ने सुनवाई के चौथे दिन पीठ को बताया, ‘‘इस देवता की प्रसिद्धि और श्रद्धा का मूल आधार नैष्ठिक ब्रह्मचारी रूप में निहित है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘इसीलिए, जब आप वहां जाते हैं, तो आपको व्रत करना पड़ता है। आम लोग उससे पहले 40 या 41 दिन तक उपासना करते हैं। आप व्रत करें या न करें, यह अलग बात है, लेकिन सिद्धांत यही है। अब, हमें इसे अनुच्छेद 14 से जोड़ना होगा। मुख्य तर्क यह है कि हम महिलाओं को इससे बाहर कर रहे हैं।’’
उन्होंने कहा, ‘‘सबसे पहले, याद रखें, महिलाओं पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है। दस वर्ष से कम और 50 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं को अनुमति है। दूसरा, 10 से 50 वर्ष की आयु सीमा के भीतर, आप उन महिलाओं का वर्गीकरण कर रहे हैं जो नहीं जा सकतीं।’’
सिंघवी ने दलील दी कि धर्म एक ऐसी मान्यताओं और प्रथाओं का समूह है, जिसका पालन एक समान पहचान वाले समुदाय द्वारा किया जाता है और अदालत इन मान्यताओं पर फैसला नहीं कर सकती।
सुनवाई बृहस्पतिवार को भी जारी रहेगी।
सितंबर 2018 में, पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से दिए गए निर्णय में, 10 से 50 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं के शबरिमला अयप्पा मंदिर में प्रवेश पर प्रतिबंध को हटा दिया था। न्यायालय ने यह भी कहा था कि सदियों पुरानी यह हिंदू धार्मिक परंपरा अवैध और असंवैधानिक है।
बाद में, 14 नवंबर 2019 को तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की एक और पीठ ने 3:2 के बहुमत से, विभिन्न उपासना स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव के मुद्दे को एक बड़ी पीठ के पास भेज दिया।
भाषा
देवेंद्र नरेश
नरेश