जयपुर, 15 अप्रैल (भाषा) राजस्थान वन विभाग ने रणथम्भौर बाघ अभयारण्य में बुधवार को ‘कैराकल संरक्षण कार्यशाला’ का आयोजन कर ‘प्रोजेक्ट कैराकल’ की औपचारिक शुरुआत की। विभाग ने एक बयान में यह जानकारी दी।
उसने बताया कि इस कार्यशाला में वरिष्ठ वन अधिकारी, वन्यजीव विशेषज्ञ, शोधकर्ता और संरक्षण से जुड़े संस्थानों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
विभाग के मुताबिक कार्यशाला का मुख्य जोर एशियाई कैराकल के संरक्षण पर रहा।
कैराकल एक दुर्लभ और कम दिखाई देने वाली जंगली बिल्ली है, जो पहले राजस्थान के शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में पाई जाती थी, लेकिन आवास क्षरण, क्षेत्रीय विखंडन और शिकार की कमी के कारण इसकी संख्या में तेजी से गिरावट आई है, जिससे इसके संरक्षण की आवश्यकता और बढ़ गई है।
विभाग के अनुसार कार्यशाला में कैराकल की वर्तमान स्थिति, वितरण और उपलब्ध आंकड़ों की समीक्षा की गई। साथ ही इसके आवास, पारिस्थितिकी और जनसंख्या रुझानों पर विस्तृत चर्चा हुई।
‘प्रोजेक्ट कैराकल’ के तहत राज्य में इसकी स्थिति का आकलन, महत्वपूर्ण आवासों की पहचान, निगरानी और अनुसंधान को मजबूत बनाने तथा स्थानीय समुदाय की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया गया।
विशेषज्ञों ने रणथम्भौर, मुकुन्दरा हिल्स और रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व जैसे क्षेत्रों में संरक्षण की चुनौतियों एवं समाधान पर भी विचार-विमर्श किया।
वन विभाग ने उम्मीद जताई कि इस पहल से राजस्थान में कैराकल के दीर्घकालीन संरक्षण को मजबूती मिलेगी और जैव विविधता संरक्षण के प्रयासों को नई दिशा मिलेगी।
कार्यक्रम में भारतीय वन्यजीव संस्थान के निदेशक डॉ. जी.एस. भारद्वाज और मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक के.सी.ए. अरुण प्रसाद सहित कई विशेषज्ञ मौजूद रहे।
भाषा बाकोलिया राजकुमार
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