नयी दिल्ली, 15 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने तमिलनाडु गुंडा अधिनियम के तहत यूट्यूबर एवं पत्रकार सावुक्कू शंकर की एहतियातन हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका पर बुधवार को विचार करने से इनकार कर दिया और याचिकाकर्ता को मद्रास उच्च न्यायालय से संपर्क करने को कहा।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने मामले की सुनवाई की तथा कहा कि याचिका की पड़ताल के लिए उच्च न्यायालय उचित मंच होगा।
इसने कहा कि अगर संपर्क किया गया तो उच्च न्यायालय मामले की शीघ्र सुनवाई पर विचार कर सकता है।
याचिका शंकर के भतीजे डी भरत द्वारा दायर की गई थी, जिसमें बंदी प्रत्यक्षीकरण संबंधी रिट के आग्रह के साथ ही गुंडा अधिनियम के तहत शंकर के खिलाफ जारी तीसरे हिरासत आदेश को रद्द करने का अनुरोध किया गया था।
शंकर को शुरुआत में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के प्रावधानों के तहत दर्ज जबरन वसूली के एक मामले में 13 दिसंबर, 2025 को गिरफ्तार किया गया था। उनकी गिरफ्तारी के बाद, उनकी मां ने उनके लिए चिकित्सा उपचार का आग्रह करते हुए मद्रास उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
इसके साथ ही एक अलग बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका भी दायर की गई, जिसमें आरोप लगाया गया था कि शंकर को अन्य कैदियों से अलग रखा जा रहा है।
बाद में उच्च न्यायालय ने शंकर को चिकित्सा आधार पर अंतरिम जमानत दे दी और अपने आदेश में, असहमति के अधिकार का प्रयोग करने पर उन्हें कथित रूप से निशाना बनाए जाने को लेकर तमिलनाडु सरकार की आलोचना की।
जमानत आदेश के खिलाफ एक अपील खारिज कर दी गई, हालांकि एक खंडपीठ ने अतिरिक्त शर्तें लगा दीं, जिसमें शंकर के सार्वजनिक बयानों, गवाहों के साथ बातचीत और चिकित्सा या कानूनी आवश्यकताओं के बाहर आने-जाने पर प्रतिबंध शामिल थे।
बाद में, शंकर ने इन जमानत शर्तों में संशोधन का आग्रह करते हुए शीर्ष अदालत का रुख किया।
हालाँकि, जनवरी में, शीर्ष अदालत ने यह उल्लेख करते हुए हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया कि याचिकाकर्ता ने चिकित्सा आधार पर जमानत हासिल करने के बाद वीडियो और सोशल-मीडिया सामग्री जारी करना फिर से शुरू कर दिया था।
शंकर को बीएनएस के विभिन्न प्रावधानों के तहत पुझल थाने में दर्ज दो मामलों में 8 अप्रैल को फिर से गिरफ्तार किया गया था।
अगले दिन, अधिकारियों ने गुंडा अधिनियम की धारा 2 (एफ) के तहत उन्हें ‘‘गुंडा’’ करार देते हुए एहतियातन हिरासत का आदेश जारी किया। इस आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने कहा था कि यह कानूनों के दुरुपयोग को दर्शाता है।
याचिका में इस बात पर प्रकाश डाला गया था कि न्यायिक जांच के बाद शंकर के खिलाफ पहले के दो हिरासत आदेशों को रद्द कर दिया गया था या रद्द कर दिया गया था।
इसमें आरोप लगाया गया था कि तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) सरकार की अवैध और भ्रष्ट गतिविधियों को उजागर करने पर राज्य की एजेंसियों द्वारा शंकर को परेशान किया जा रहा है।
याचिका में उनकी मां के पेंशन खाते को कथित तौर पर बंद करने और उनके सहयोगियों के खिलाफ कार्रवाई पर भी चिंता जताई गई थी।
भाषा नेत्रपाल रंजन
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