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दिल्ली : अदालत ने वन्यजीव अपराध मामले में शहतूश शॉल व्यापारी को दोषी करार दिया

नयी दिल्ली, 15 अप्रैल (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने जयपुर स्थित एक आर्ट गैलरी के मालिक को लुप्तप्राय तिब्बती मृग के फर से बने शहतूश शॉल के अवैध निर्यात की कोशिश के मामले में दोषी ठहराते हुए अधिकतम तीन वर्ष कारावास की सजा सुनाई है।

यह पहली बार है जब केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा वन्यजीव अपराध के मामले में मुकदमा चलाया गया।

राउज़ एवेन्यू जिला न्यायालय की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट टी. प्रियदर्शनी ने 17 साल लंबी कानूनी लड़ाई के बाद 12 मार्च को सैयद शाहिद अहमद कशानी के खिलाफ फैसला सुनाया।

शहतूश शॉल तस्करी का मामला उस वक्त सामने आया, जब सीमा शुल्क विभाग ने जयपुर स्थित इंडिया आर्ट हाउस के मालिक कशानी द्वारा 2008 में मस्कट को निर्यात की गई 1,290 शॉल के संबंध में वन्यजीव अधिकारियों के अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) की मांग की।

वर्ष 2007 में स्थापित वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (डब्ल्यूसीसीबी)ने निरीक्षण के लिए अपनी एक अधिकारी,निरीक्षक आरती सिंह को भेजा। उन्हें एक पैकेज में निर्यात के लिए तैयार पांच शॉल मिले, जिनके तिब्बती मृग (चिरू) से प्राप्त अत्यंत हल्की ऊन शहतूश से बने होने का संदेह हुआ। उन्होंने विशेषज्ञों की राय के लिए शॉल को देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) को भेज दिया।

डब्ल्यूआईआई ने अपनी रिपोर्ट में पुष्टि की कि शॉल में वास्तव में लुप्तप्राय तिब्बती मृग से प्राप्त फर थे, जो वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची-1 में सूचीबद्ध एक जानवर है और हिमालय की अत्यधिक ऊंचाइयों पर पाया जाता है।

अधिकारियों ने बताया कि फर से बने शॉल बेहद हल्के और गर्म होते हैं, लेकिन इनकी पर्यावरणीय कीमत बहुत अधिक होती है, क्योंकि इन उत्कृष्ट वस्तुओं के उत्पादन के लिए कई जानवरों को मारना पड़ता है।

एक अधिकारी ने बताया, ‘‘तिब्बती मृग, जिसे स्थानीय रूप से चिरू के नाम से जाना जाता है, वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची-1 में सूचीबद्ध है और घरेलू कानून के तहत इसका व्यापार सख्ती से प्रतिबंधित है। भारत ने जिस संधि पर हस्ताक्षर किए हैं, उसके तहत शहतूश शॉल का व्यापार भी 1975 से वैश्विक स्तर पर वन्यजीवों और वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर संधि (सीआईटीईएस) के तहत प्रतिबंधित है।’’

निरीक्षक सिंह ने बाद की जांच में 36 और शॉल की पहचान की, जिनके शहतूश ऊन से बने होने का संदेह था।

सरकार द्वारा जारी बयान के मुताबिक, जांच के निष्कर्षों के आधार पर, तत्कालीन क्षेत्रीय उप निदेशक, डब्ल्यूसीसीबी रमेश कुमार पांडे ने सीबीआई में शिकायत दर्ज कराई और फोरेंसिक नमूनों के रूप में भेजे गए 36 शॉल के संबंध में डब्ल्यूआईआई के साथ सक्रिय रूप से समन्वय किया।

बयान के मुताबिक, पांडे वर्तमान में डब्ल्यूसीबी में एडीजी वन्यजीव और निदेशक (पदेन) हैं, पूरी प्रक्रिया के दौरान जुड़े रहे।

बाद में डब्ल्यूआईआई ने पुष्टि की कि 36 शॉल में तिब्बती मृग के फर का इस्तेाल किया गया है, जिसके बाद सीबीआई ने आरोप पत्र दाखिल किया।

लगभग 17 वर्षों के बाद डब्ल्यूसीसीबी ने 32 गवाहों की जांच, जिनमें से 19 ने आरोप पूर्व साक्ष्य प्रस्तुत किए, अदालत ने कशानी को इस अपराध के लिए दोषी ठहराया।

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट टी प्रियदर्शनी ने फैसले में कहा, ‘‘अभियोजन पक्ष ने संदेह से परे यह साबित कर दिया है कि प्रतिबंधित वस्तु, अर्थात् शहतूश शॉल, उस खेप में पाई गई थी, जिसका निर्यात आरोपी द्वारा किया जा रहा था।’’

अदालत ने दोषी कशानी को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की धारा 49बी(1)/51(1ए) के तहत तीन साल के कारावास और 50,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई, तथा अधिनियम की धारा 40 और 49 के तहत दो-दो साल की सजा सुनाई। सभी सजाएं साथ-साथ चलेंगी।

भाषा धीरज सुभाष

सुभाष