अमेरिका और ईरान के बीच रविवार को स्विट्जरलैंड के बर्जेनस्टाक में कतर और पाकिस्तान की मध्यस्थता में शुरू हुई बहुप्रतीक्षित शांति वार्ता पर पहले ही दौर में संकट के बादल छा गए। दोनों पक्षों को 14 बिंदुओं वाले प्रारंभिक समझौता मसौदे के तकनीकी पहलुओं पर अगले 60 दिनों तक बातचीत कर अंतिम समझौते तक पहुंचना था, लेकिन पहले दौर की बैठक लगभग 80 मिनट ही चल सकी।
वार्ता के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के तीखे बयान से माहौल तनावपूर्ण हो गया। ट्रंप ने ईरान को लेबनान में हिजबुल्ला की गतिविधियां रोकने की चेतावनी देते हुए कहा कि ऐसा नहीं होने पर अमेरिका फिर सैन्य कार्रवाई कर सकता है। उन्होंने होर्मुज जलडमरूमध्य बंद करने की ईरानी घोषणा पर भी कड़ा रुख अपनाया और कहा कि इसे बंद करने की कोशिश हुई तो अमेरिका हस्तक्षेप करेगा।
ट्रंप के बयान के विरोध में ईरानी प्रतिनिधिमंडल बैठक छोड़कर बाहर निकल गया और उसने सामूहिक फोटो सत्र में भी भाग नहीं लिया। हालांकि, बातचीत पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है, बल्कि फिलहाल रोक दी गई है। आगे वार्ता कब और किस रूप में होगी, इसे लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बढ़ी तनातनी का असर बाजारों पर भी दिखा।
रविवार को किसी जहाज के जलडमरूमध्य पार करने की सूचना नहीं मिली, जबकि अमेरिका ने दावा किया कि पिछले 24 घंटे में 67 जहाज इस मार्ग से गुजरे हैं। तनाव के कारण खाड़ी देशों के शेयर बाजारों में गिरावट आई और सोमवार को कच्चे तेल की कीमतों में तेजी तथा वैश्विक बाजारों में दबाव की आशंका जताई जा रही है।
ईरानी दल का नेतृत्व कर रहे संसद स्पीकर गलीबाफ ने वार्ता के दौरान ट्रंप की धमकियों का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि तेहरान पर इन धमकियों का कोई असर नहीं होता। दोनों पक्षों के बीच बातचीत रोक दी गई है। यहां तक कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर भी चर्चा नहीं हो सकी। प्रतिनिधिमंडल ने ट्रंप की टिप्पणियों के विरोध में वार्ता का बहिष्कार किया और वार्ता स्थल से लौट गया।
दोनों पक्ष अपने-अपने स्तर पर आंतरिक चर्चा के लिए लौटे हैं। आगे की रणनीति और प्रस्तावों पर विचार के लिए वार्ता को अस्थायी रूप से रोका गया है। फिलहाल इसे बातचीत का टूटना नहीं माना जा रहा है। दोनों पक्षों के बीच आगे भी चर्चा जारी रहने की उम्मीद है। वार्ता को सफल बनाने के लिए कतर के पीएम व विदेश मंत्री अब्दुलरहमान अल थानी, पाकिस्तानी पीएम शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के अलावा अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आइएईए) के प्रमुख राफेल ग्रोसी भी इसमें शामिल हुए।