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अरावली को लेकर बढ़ रहा विवाद, सामाजिक संगठनों के साथ राजनीतिक पार्टियों के बीच भी आरोप-प्रत्यारोप

गुजरात से लेकर राजस्थान और हरियाणा होते हुए बाहरी दिल्ली तक फैली अरावली पर्वतमाला दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में एक है। इन पहाड़ियों का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा राजस्थान में है। जानकारों का कहना है कि ये पहाड़ियां पारिस्थितिक रूप से कई मायनों में महत्वपूर्ण हैं: 

ये थार रेगिस्तान के पूर्व की ओर विस्तार को रोकती हैं। भूजल को रिचार्ज करने में मदद करती हैं। वन्यजीव गलियारों को संरक्षित रखती हैं और जैव विविधता से भरपूर हैं। ये उत्तर-पश्चिम भारत में जलवायु को नियंत्रित करने में भी सहायक हैं।

हालांकि, कुछ इलाकों में, कथित तौर पर जरूरत से ज्यादा खनन की वजह से इन पहाड़ियों को भारी नुकसान पहुंचा है। राजस्थान के भरतपुर जिले का ये गांव इसकी मिसाल है। यहां की पूरी पहाड़ियां समतल हो गई हैं। भूभाग खोखला हो गया है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि जरूरत से ज्यादा खनन ने यहां की पारिस्थितिकी को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है। इसकी वजह से यहां सूखा पड़ना आम बात हो गई है।

केंद्र सरकार ने अरावली पर्वतमाला की परिभाषा में बदलाव किया। हाल में सुप्रीम कोर्ट ने नई परिभाषा को बरकरार रखा। इसके बाद से अरावली पर्वतमाला के भविष्य को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। नई परिभाषा के मुताबिक, 'अरावली पहाड़ी' वो भू-आकृति है जिसकी ऊंचाई उसके आसपास के भूभाग से कम से कम 100 मीटर ज्यादा हो, और 'अरावली पर्वतमाला' दो या दो से अधिक ऐसी पहाड़ियों का समूह है जो एक दूसरे से कम से कम 500 मीटर की दूरी पर हों।

पर्यावरण के जानकारों का कहना है कि इससे छोटी और पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण पहाड़ियों की असुरक्षा बढ़ गई है। अब वहां खनन और निर्माण काम किए जा सकते हैं। इसका नतीजा जल असुरक्षा के रूप में होगा। साथ ही जैव विविधता और जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशीलता पर लंबे समय तक गंभीर असर पड़ सकता है।

बहस का मुख्य मुद्दा आजीविका भी है। खदान मालिकों का कहना है कि रोजगार के लिए संतुलन बनाए रखना जरूरी है। उनका तर्क है कि खनन पर पूरी तरह रोक लगने से ग्रामीण इलाकों में संकट पैदा हो जाएगा। मेवात जैसे इलाकों में रोजगार के मौके सीमित हैं और खनन से कई परिवारों की रोजी-रोटी चल रही है।

हालांकि, पूर्व अधिकारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं समेत कई लोगों का आरोप है कि अरावली में खनन से स्थानीय लोगों को कोई ठोस फायदा नहीं हुआ है। इस बीच, अरावली पर्वत श्रृंखला से जुड़े सभी इलाकों, खास कर राजस्थान में, 'अरावली बचाओ' आंदोलन चल रहे हैं। इस मुद्दे ने राजनीतिक रूप ले लिया है। कांग्रेस ने भी इन आंदोलनों का समर्थन किया है।

सरकार ने विरोध को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताकर खारिज कर दिया है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री ने जोर दिया कि केंद्र अवैध खनन रोकने के लिए राजस्थान सरकार का पूरा साथ दे रहा है। भूपेंद्र यादव का ये भी कहना है कि हालात को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है और संकट को बढ़ा-चढ़ाकर बताया जा रहा है।

जोर पकड़ते विवाद के बीच, केंद्र सरकार ने बुधवार को सभी राज्यों को अरावली में नए खनन पट्टे देने पर रोक लगाने का निर्देश दिया। पर्यावरण और वन मंत्रालय ने भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद को पूरे अरावली इलाके में उन जगहों की पहचान करने का भी निर्देश दिया है, जहां केंद्र ने पहले से ही खनन पर रोक लगा रखा है।

अरावली का मुद्दा गरम हो गया है। कांग्रेस ने केंद्र के कदम को "नुकसान कम करने का झूठा प्रयास" बताया है, जिससे किसी को मूर्ख नहीं बनाया जा सकता। फिलहाल, अरावली का भविष्य अधर में है। इसे लेकर दावे-प्रतिदावे, आरोप-प्रयारोपों का दौर बढ़ता जा रहा है।