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बंगाल चुनाव में हुआ एक और समझौता, एक साथ आईं ये तीन पार्टियां

पश्चिम बंगाल की सियासी फिजाओं में इस बार बदलाव की एक नई सुगबुगाहट है। साल 2021 के विधानसभा चुनावों में जिस वाम मोर्चे का सूपड़ा साफ हो गया था, वह इस बार अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए एक नए और मजबूत कलेवर में नजर आ रहा है। बुधवार को कोलकाता में हुई एक घोषणा ने बंगाल की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। वाम मोर्चे के चेयरमैन बिमान बोस ने इस बार अकेले चलने के बजाय पुराने और नए साथियों को साथ लेकर चलने का फैसला लिया है। अब बंगाल के लोगों के पास कई विकल्प हो गए हैं।

लेफ्ट ने इस बार अपनी रणनीति को काफी लचीला और समावेशी बनाया है। बुधवार को हुए समझौते के अनुसार, पश्चिम बंगाल की कुल 294 विधानसभा सीटों में से वाम मोर्चा खुद 252 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगा। इस गठबंधन में इंडियन सेकुलर फ्रंट (ISF) को 30 सीटें दी गई हैं, जबकि सीपीआई (ML) लिबरेशन के हिस्से में 8 सीटें आई हैं।

बिमान बोस ने साफ शब्दों में कहा कि मौजूदा राजनीतिक माहौल में यह चुनाव उनके लिए एक बड़ी चुनौती और अवसर दोनों है। पिछली बार के चुनाव में लेफ्ट का खाता भी नहीं खुला था और ISF को केवल एक सीट पर संतोष करना पड़ा था, इसलिए इस बार कोई भी गलती न करने की ठानी गई है।वाम मोर्चे के भीतर भी सीटों का बंटवारा इस तरह किया गया है कि हर घटक दल की मौजूदगी बनी रहे। हमेशा की तरह इस बार भी सीपीआई-एम सबसे बड़े भाई की भूमिका में है और राज्य की 195 सीटों पर अपनी किस्मत आजमाएगी। इसके बाद ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक को 23 सीटें मिली हैं, जबकि सीपीआई और आरएसपी को 16-16 सीटों पर चुनाव लड़ने का मौका दिया गया है।

इन सब के बीच दिलचस्प यह है कि गठबंधन ने आरसीपीआई (RCPI) और मार्क्सवादी फॉरवर्ड ब्लॉक के लिए भी एक-एक सीट छोड़ी है। इसके अलावा, तीन सीटें अन्य लोकतांत्रिक और सामाजिक संगठनों के लिए रखी गई हैं, जिन्हें लेफ्ट बाहर से अपना समर्थन देगा। यह बंटवारा दर्शाता है कि लेफ्ट इस बार जमीनी स्तर पर हर छोटे-बड़े समूह को जोड़कर एक विशाल सामाजिक आधार तैयार करने की कोशिश कर रहा है।

इस गठबंधन का मुख्य उद्देश्य उन मतों को एकजुट करना है जो अक्सर अलग-अलग दलों में बंट जाते थे। पश्चिम बंगाल में दो चरणों में होने वाले इस चुनाव में 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को जनता अपने मताधिकार का प्रयोग करेगी। बिमान बोस की रणनीति स्पष्ट है कि अगर विपक्षी वोट एकजुट रहे, तो सत्ताधारी दल और मुख्य विपक्षी दल के लिए राह आसान नहीं होगी।