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Delhi Politics: सीएम आतिशी का केजरीवाल के लिए कुर्सी छोड़ना गलत?

दिल्ली में बीते एक हफ्ते में बड़ी सियासी उठापटक देखने को मिल रही है। जहां पहले केजरीवाल जेल से बेल पर बाहर आए और फिर अपने सीएम पद से इस्तीफा दिया। इस्तीफे के बाद आतिशी को दिल्ली का नया सीएम चुना गया है। जहां उन्होंने दिल्ली की कमान संभाल ली है। मगर जिस तरिके से उन्होंने केजरीवाल की कुर्सी पर न बैठकर अपनी अलग कुर्सी लगाई है और कहा है कि यहां इस सीट पर केवल केजरीवाल बैठ सकते है। ये पूरा घटनाक्रम इस समय चर्चा का विषय बना हुआ है।

सवाल ये कि क्या भारत के संविधान में 'भरत के खड़ांऊ' का कोई प्रावधान है? क्या खड़ाऊं मुख्यमंत्री का कोई प्रावधान है? क्योंकि आतिशी की ओर से कहा गया है कि जिस तरीके से भगवान राम के वनवास जाने के बाद उनके छोटे भाई भरत ने भगवान राम के खड़ाऊं रखकर अयोध्या का राजपाट संभाला था ठीक उसी तरह वो भी दिल्ली में मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालेंगी और चार महीने बाद केजरीवाल को वापस मुख्यमंत्री बनाकर इसी कुर्सी पर बैठा देंगी लेकिन तब तक ये कुर्सी इसी तरह खाली रहेगी।

राजनीति करने, तस्वीरें खिंचवाने और केजरीवाल को खुश करने के साथ ही अपनी वफादारी साबित करने के लिए ये तरीका शायद सही हो लेकिन लोकतंत्र की नजर में ये संविधान का अपमान है और ये अपमान भी तब हो रहा है जब उस कुर्सी के पीछे भारतीय संविधान के निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर की तस्वीर लगी हुई है। समय कुछ एसा है कि नेता अपनी-अपनी सहूलियत के अनुसार खुद ही संविधान में संशोधन कर लेते हैं। आखिर कैसे कोई सरकारी पद किसी व्यक्ति या विशेष पार्टी का हो सकता है? क्योंकि संविधान कहता है कि ये पद लोकतंत्र में लोगों का होता है और लोग जिसे चुनते हैं वही नेता इस कुर्सी पर बैठकर उनके लिए काम करता है लेकिन इस मामले में क्या सब कुछ संविधान के हिसाब से हो रहा है? संविधान की रक्षा के नाम पर वोट मांगने वाली तमाम पार्टियां अब इस नई व्यवस्था का समर्थन भी कर रही हैं।