मुंबई, चार नवंबर (भाषा) यूपीआई के कुछ लेनदेन पर शुल्क लगाने का असर छोटे कारोबारियों पर भी पड़ सकता है। इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस (आईएसबी) के एक सर्वेक्षण के मुताबिक, करीब 70 प्रतिशत रेहड़ी-पटरी वाले विक्रेता अपने आपूर्तिकर्ताओं को एक बार में 2,000 रुपये से अधिक का भुगतान करते हैं। ऐसे में खुदरा लेनदेन पर शुल्क से छूट मिलने के बावजूद उन्हें थोक खरीद के दौरान अतिरिक्त लागत उठानी पड़ सकती है।
आईएसबी के इस सर्वेक्षण में देशभर के 720 से अधिक रेहड़ी-पटरी वाले विक्रेताओं को शामिल किया गया। इसमें 10.4 प्रतिशत विक्रेताओं ने बताया कि सर्वेक्षण से पहले के 10 दिनों में उनके आपूर्तिकर्ताओं ने यूपीआई से भुगतान करने पर उनसे अतिरिक्त शुल्क मांगा था।
अध्ययन के मुताबिक, खुदरा लेनदेन पर शुल्क से छूट मिलने से छोटे कारोबारियों को कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन इससे थोक खरीद के दौरान होने वाले भुगतान की लागत से उन्हें पूरी तरह राहत नहीं मिल सकती।
सरकार ने इस साल की शुरुआत में 2,000 रुपये से अधिक के व्यापारी यूपीआई लेनदेन पर 0.40 प्रतिशत तक मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लगाने की अनुमति दी थी। हालांकि, करीब 96 प्रतिशत लेनदेन को इससे छूट दी गई है।
भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) ने पहले 15 अक्टूबर से इसे लागू करने की योजना बनाई थी, लेकिन बाद में इसे दिवाली के बाद तक टाल दिया गया। इसके लागू होने की नई तारीख अभी स्पष्ट नहीं है।
आईएसबी के एसोसिएट प्रोफेसर प्रसन्ना तंत्री ने संवाददाताओं से कहा कि यूपीआई के मुफ्त लेनदेन के कारण कारोबारियों को कितना नुकसान हो रहा है, इसका कोई स्पष्ट आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। उन्होंने कहा कि मौजूदा व्यवस्था को जारी रखना संभव नहीं होने पर ही यूपीआई लेनदेन पर शुल्क लगाने पर विचार किया जाना चाहिए।
तंत्री के मुताबिक, यूपीआई की लागत का आकलन करते समय इससे मिलने वाले फायदे को भी ध्यान में रखना चाहिए। इसमें उपभोक्ताओं के खरीदारी व्यवहार से जुड़ी जानकारी भी शामिल है। उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था की लागत और फायदे का समग्र आकलन किए बिना शुल्क लगाने का फैसला नहीं किया जाना चाहिए।
वित्तीय सेवा क्षेत्र की कंपनियों का तर्क है कि यूपीआई से जुड़े बुनियादी ढांचे और सॉफ्टवेयर में निवेश के लिए राजस्व का स्रोत जरूरी है। वहीं, सरकार यूपीआई को नकदी के इस्तेमाल में कमी लाने के एक अहम माध्यम के रूप में देखती है और इसके लिए सब्सिडी भी देती रही है। कुछ शिक्षाविदों का मानना है कि यूपीआई से होने वाले फायदे इसकी लागत से अधिक हैं।
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