नयी दिल्ली, चार नवंबर (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह एक पत्रकार को 11.8 लाख रुपये का भुगतान करे। पत्रकार ने यह राशि अपनी पत्नी के एक निजी अस्पताल में इलाज पर खर्च की थी।
सरकारी अस्पताल में इलाज उपलब्ध नहीं होने के कारण पत्रकार को अपनी पत्नी को निजी अस्पताल ले जाना पड़ा था।
न्यायमूर्ति अमित महाजन ने कहा कि मान्यता प्राप्त पत्रकार रविंदर गुप्ता ने अपनी पत्नी के सर गंगाराम अस्पताल और सर गंगाराम सिटी अस्पताल में हुए इलाज पर आए खर्च की प्रतिपूर्ति का मामला उचित तरीके से अदालत के समक्ष रखा है।
अदालत ने 29 अक्टूबर को दिल्ली सरकार के वकील की इस दलील को खारिज कर दिया था कि चिकित्सा खर्च की प्रतिपूर्ति का दावा करने के लिए सरकारी अस्पताल में हड़ताल होना जरूरी है और केवल किसी सरकारी अस्पताल को कोविड अस्पताल घोषित कर दिए जाने को हड़ताल के समान नहीं माना जा सकता।
अदालत ने कहा, ‘‘मरीज के दृष्टिकोण से देखें तो सरकारी अस्पताल में हड़ताल और उसे कोविड अस्पताल घोषित किए जाने की स्थिति में कार्यात्मक समानता है, क्योंकि दोनों ही स्थितियों में सामान्य बाह्य रोगी और भर्ती मरीजों को मिलने वाली सेवाएं अचानक बंद हो जाती हैं और मरीज को इलाज के लिए दूसरी जगह जाने को मजबूर होना पड़ता है।’’
उसने कहा, ‘‘हालांकि हड़ताल और कोविड-19 अस्पताल घोषित किए जाने के कारण बिल्कुल अलग हैं, लेकिन याचिकाकर्ता के लिए दोनों का परिणाम एक जैसा था। संबंधित अवधि के दौरान उनकी पत्नी कोविड से संक्रमित नहीं थीं, लेकिन उन्हें सरकारी अस्पताल में आपातकालीन चिकित्सा सुविधा नहीं मिल सकी और याचिकाकर्ता को निजी अस्पताल की सेवाएं लेनी पड़ीं।’’
अदालत ने दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य सेवा निदेशक को आठ सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता को 11.83 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया।
गुप्ता ने बताया था कि अगस्त 2021 में उनकी पत्नी की तबीयत खराब थी और जीबी पंत अस्पताल ने उन्हें दूसरे अस्पताल में जाने को कहा था, क्योंकि वहां रक्त वाहिकाओं की सर्जरी (वैस्कुलर सर्जरी) की सुविधा उपलब्ध नहीं थी।
याचिका में कहा गया कि सरकारी अस्पतालों को कोविड अस्पताल घोषित किए जाने के कारण वहां आवश्यक इलाज उपलब्ध नहीं था। ऐसे में याचिकाकर्ता को अपनी पत्नी का आपातकालीन उपचार निजी अस्पताल में कराने के लिए मजबूर होना पड़ा।
भाषा संतोष माधव अविनाश
अविनाश