नयी दिल्ली, चार नवंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने जनसंख्या वृद्धि में कमी आने से दूरगामी असर पड़ने का उल्लेख करते हुए बुधवार को कहा कि प्रजनन दर में ऐसी गिरावट को रोकने के लिए सावधानी बरतनी चाहिए तथा बदलती जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं के अनुरूप कदम उठाने चाहिए।
बदलती वास्तविकताओं के साथ तालमेल बिठाने के लिए कानून में बदलाव करने की जरूरत बताते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि किसी कानून की प्रासंगिकता और औचित्य का आकलन केवल उस समय की परिस्थितियों के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए जब वह कानून बनाया गया था, बल्कि मौजूदा सामाजिक वास्तविकताओं के संदर्भ में किया जाना चाहिए।
न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने कहा, ‘‘न्याय पाने के लिए बदलाव के अनुरूप ढलना जरूरी है, क्योंकि ऐसा न कर पाना अन्याय को जन्म देता है...।’’
पीठ ने कहा कि दो से अधिक संतान होने पर दंडित करने वाले कानूनों की प्रासंगिकता अब खत्म हो चुकी है, क्योंकि पिछले कुछ दशकों में आए जनसांख्यिकीय बदलावों के चलते अत्यधिक जनसंख्या का डर अब खत्म हो गया है।
न्यायालय ने मंगला भीमराव इंगले की याचिका पर अपना फैसला सुनाया। काकोडा ग्राम पंचायत सरपंच पद पर उनके निर्वाचन को इस आधार पर रद्द कर दिया गया था कि वह चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य थीं, क्योंकि उनकी दो से अधिक संतान थी और यह महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 की धारा 14(1)(जे-1) का उल्लंघन करता था।
पीठ ने कहा कि विधायी सुधारों के जरिए कानूनी व्यवस्था को बेहतर बनाया जा सकता है। इसके लिए यह आकलन करना जरूरी होगा कि कानून किस तरह काम कर रहा है, लोगों की उस तक पहुंच कैसी है, वह कितना उपयोगी है और कहीं उसका दुरुपयोग तो नहीं हो रहा है।
न्यायालय ने यह भी कहा कि सरकार का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि किसी कानून को लागू करते समय उसके उद्देश्य और लक्ष्य पूरे होने को सुनिश्चित करे।
पीठ ने कहा, ‘‘किसी कानून के क्रियान्वयन की समीक्षा और आकलन करना कानून के शासन का एक अहम हिस्सा है। इस तरह की समीक्षा का मकसद यह सुनिश्चित करना होता है कि कोई कानून असल में उसी तरह काम कर रहा है, जैसा कि उसे लागू करते समय परिकल्पित किया गया था। अगर ऐसा नहीं है, तो इसके कारणों को समझना और खामियों को जल्द से जल्द दूर करना जरूरी है।
न्यायालय ने यह भी कहा कि किसी खास सामाजिक समस्या को सुलझाने के लिए बनाया गया कानून, समय के साथ अपनी प्रासंगिकता खो सकता है, खासकर जब वे परिस्थितियां ही काफी हद तक बदल जाएं, जिनके आधार पर वह कानून बनाया गया था।
पीठ ने कहा, ‘‘हालांकि यह अदालत सरकार को किसी कानून को रद्द करने या उसमें संशोधन करने का निर्देश नहीं दे सकती, लेकिन वह निश्चित रूप से यह पड़ताल कर सकती है कि बदली हुई परिस्थितियों में उस कानून का लागू रहना संवैधानिक रूप से उचित है या नहीं।’’
चीन का उदाहरण देते हुए पीठ ने कहा कि जनसंख्या की घटती वृद्धि दर के परिणाम से उबर पाना बहुत मुश्किल होता है।
न्यायालय ने कहा कि चीन के अलावा, ऐसे कई अन्य देश भी हैं जो अब घटती आबादी और जनसंख्या में बुजुर्गों की बढ़ती संख्या से पैदा हुई समस्या का सामना कर रहे हैं।
पीठ ने कहा, ‘‘उदाहरण के लिए, जापान में कई वर्षों से आबादी में भारी गिरावट आई है। इसके साथ ही, वहां भारी सार्वजनिक कर्ज है और अपनी बुजुर्ग आबादी के स्वास्थ्य तथा दीर्घकालिक देखभाल पर सरकार को बहुत अधिक खर्च करना पड़ रहा है। इन सभी बातों से देश के समक्ष वित्तीय और विकासात्मक चुनौतियां और बढ़ गई हैं।’’
न्यायालय ने कहा, ‘‘सवाल यह नहीं है कि कानून को पूर्ववत रहना चाहिए या उसमें बदलाव की अनुमति होनी चाहिए। कानून में बदलाव स्वाभाविक है।’’
पीठ ने कहा कि पहले की यह धारणा कि जनसंख्या का विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, अब मायने नहीं रखता है।
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