नयी दिल्ली, चार नवंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय बुधवार को राजद सांसद मनोज झा और सामाजिक कार्यकर्ता अरुण अग्रवाल की उन याचिकाओं पर सुनवाई करने के लिए सहमत हो गया, जिनमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) और निर्वाचन आयुक्तों पर मुकदमा चलाये जाने से छूट देने वाले कानून के एक प्रावधान की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने केंद्र को नोटिस जारी किया तथा चार सप्ताह के भीतर जवाब मांगा।
पीठ ने राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के सांसद की ओर से पेश वकील फौजिया शकील और अग्रवाल की ओर से पेश वकील नेहा राठी से कहा कि शीर्ष अदालत इस मामले को इसी तरह के मुद्दे पर लंबित एक अन्य याचिका के साथ संलग्न कर रही है।
मामले को 18 दिसंबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है।
राजद सांसद ने अपनी याचिका में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 16 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है। यह धारा देश की अदालतों को ऐसे किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कोई दीवानी या आपराधिक कार्यवाही शुरू करने या जारी रखने से रोकती है, जो सीईसी या निर्वाचन आयुक्त हैं या रह चुके हों।
यह रोक इन अधिकारियों के अपने आधिकारिक कर्तव्यों का पालन करने के दौरान किये गए कार्यों पर लागू होती है।
राजद सांसद ने कहा कि इस कानून की धारा 16 गैर-निर्वाचित अधिकारियों को एक ऐसा सुरक्षा-कवच देती है, जो संविधान देश के राष्ट्रपति, संसद के हर सदस्य, और इस अदालत तथा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश को भी नहीं देता है।
झा ने याचिका में दलील दी कि राष्ट्रपति पर उनके कार्यकाल के खत्म होते ही किसी अपराध के लिए मुकदमा चलाया जा सकता है, जबकि एक पूर्व निर्वाचन आयुक्त पर कभी भी मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
इसी तरह अग्रवाल ने अपनी याचिका में दलील दी कि धारा 16 को सरसरी तौर पर देखने से ही पता चल जाता है कि इसके तहत कितना व्यापक संरक्षण दिया गया है, जिसके तहत भ्रष्टाचार, जालसाजी और अन्य गंभीर अपराधों सहित हर मामले में मुकदमा चलाने पर रोक है।
भाषा सुभाष अविनाश
अविनाश