नयी दिल्ली, चार नवंबर (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने वैवाहिक विवादों में क्रूरता के आरोप लगाकर पति के रिश्तेदारों को भी मामले में फंसाने की प्रवृत्ति पर चिंता जताते हुए बुधवार को कहा कि जब कोई महिला अपने वैवाहिक जीवन में हिंसा की शिकायत करे तो उसके परिवार को समय रहते उसका साथ देना चाहिए।
अदालत ने कहा कि परिवार को विवाहित महिला को ‘‘समझौता करने’’ की सलाह देकर उसकी परेशानियों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और बेटी के मायके लौटने को माता-पिता के लिए कभी भी ‘‘शर्म’’ की बात नहीं माना जाना चाहिए।
उच्च न्यायालय ने कहा कि क्रूरता का सामना करने वाली महिला को कानून के तहत प्रभावी संरक्षण मिलना चाहिए, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि पति के रिश्तेदारों को केवल उससे संबंध होने के कारण आपराधिक मुकदमे का सामना न करना पड़े।
न्यायमूर्ति मधु जैन ने 2018 में विमान परिचारिका अनीसिया बत्रा की आत्महत्या के मामले में उसके पति मयंक सिंघवी को क्रूरता और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपों से मुक्त करते हुए ये टिप्पणियां कीं। अदालत ने मयंक के माता-पिता को क्रूरता और दहेज हत्या के आरोपों से मुक्त करने के अधीनस्थ अदालत के फैसले को भी बरकरार रखा।
जर्मनी की एक विमानन कंपनी में काम करने वाली अनीसिया (39) ने 13 जुलाई, 2018 को दक्षिण दिल्ली के पंचशील पार्क में कथित तौर पर आत्महत्या कर ली थी। उसके माता-पिता ने आरोप लगाया था कि उसका पति उसके साथ मारपीट करता था। मयंक अनीसिया को पास के एक अस्पताल ले गया था, जहां चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया था।
अदालत ने अपने फैसले में कहा, ‘‘यह अदालत इस बात पर भी जोर देना चाहती है कि जब कोई बेटी अपने वैवाहिक जीवन में हिंसा या लगातार दुर्व्यवहार की बात करे तो यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि मायके वाले समय रहते उसका साथ दें।’’
अदालत ने कहा, ‘‘उसकी परेशानियों को समझौता करने की सलाह देकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। समाज की अस्वीकृति के डर से उसे सुरक्षित घर देने में भी हिचकिचाना नहीं चाहिए। बेटी के माता-पिता के पास लौटने को कभी उनके लिए शर्म की बात नहीं माना जाना चाहिए। शादी बचाने को उसकी सुरक्षा एवं गरिमा से अधिक महत्व नहीं दिया जा सकता और उसका साथ देने के लिए किसी ऐसी त्रासदी का इंतजार नहीं करना चाहिए, जिसकी भरपाई न हो सके।’’
अदालत ने वैवाहिक विवादों में क्रूरता के सामान्य आरोप लगाकर पति के रिश्तेदारों को भी मामले में फंसाने की प्रवृत्ति पर चिंता जताई।
न्यायमूर्ति जैन ने कहा, ‘‘आपराधिक मुकदमे के परिणाम अदालत की कार्यवाही तक सीमित नहीं रहते। इससे व्यक्ति की प्रतिष्ठा, आजीविका और पारिवारिक जीवन भी प्रभावित होता है इसलिए कानून को क्रूरता झेलने वाली महिला को प्रभावी संरक्षण देना चाहिए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि पति के रिश्तेदारों को केवल उससे संबंध होने के कारण आपराधिक मुकदमे का सामना न करना पड़े और पति को भी बिना किसी ठोस कारण के दंडित न किया जाए।’’
अदालत ने कहा कि वैवाहिक कलह, उत्पीड़न या तनावपूर्ण संबंध अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं बन सकते, जब तक कि इसमें किसी व्यक्ति की सक्रिय और जानबूझकर की गई भूमिका न हो।
उसने कहा कि यदि महिला आत्महत्या करने से पहले कोई संदेश छोड़कर अपने इस कदम के लिए किसी अन्य व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराती है, तो भी केवल इसी आधार पर आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध साबित नहीं होता।
अदालत ने दिसंबर 2019 के सत्र अदालत के आदेश को चुनौती देने वाली तीन पुनरीक्षण याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया।
भाषा सिम्मी नरेश
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