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दो से अधिक बच्चे होने पर दंडित करने वाले कानून अब प्रासंगिक नहीं रहे: न्यायालय

नयी दिल्ली, चार नवंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि दो से अधिक बच्चे होने पर दंडित करने वाले कानूनों की प्रासंगिकता खत्म हो गई है, क्योंकि पिछले कुछ दशक में आए जनसांख्यिकीय बदलावों के चलते अत्यधिक जनसंख्या का डर अब नहीं रहा।

न्यायालय ने कहा कि 2003 के बाद से भारत की कुल प्रजनन दर 3.0 से घटकर 1.9 हो जाने के बाद, जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने के उद्देश्य से बनाए गए कानूनों का अब कोई महत्व नहीं रह गया है।

न्यायालय ने मंगला भीमराव इंगले द्वारा दायर एक याचिका पर अपना फैसला सुनाया। काकोडा ग्राम पंचायत के सरपंच पद पर उनके निर्वाचन को इस आधार पर रद्द कर दिया गया था कि वह चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य थीं, क्योंकि उनकी दो से अधिक संतान हैं, जो महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 की धारा 14(1)(जे-1) का उल्लंघन करता है।

न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने उच्चतम न्यायालय के जुलाई 2003 के एक फैसले का हवाला दिया। इस फैसले में, हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994 की वैधता की पड़ताल करने के बाद शीर्ष अदालत ने दो से अधिक जीवित संतान होने पर किसी व्यक्ति को पंचायत पदों के लिए चुनाव लड़ने या उन पदों पर बने रहने के अयोग्य ठहराए जाने को सही ठहराया था।

इस बात पर गौर करते हुए कि प्रजनन संबंधी निर्णय लेने का अधिकार, अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का एक अभिन्न अंग है, न्यायालय ने इस मामले को एक बड़ी पीठ के पास भेज दिया। यह पीठ जावेद बनाम हरियाणा राज्य (2003 का फैसला) मामले में तय किए गए सिद्धांतों पर पुनर्विचार करेगी।

न्यायालय ने कहा, ‘‘हमारा यह मानना है कि दो से अधिक संतान होने पर दंडित करने का प्रावधान करने वाले कानूनों की प्रासंगिकता अब खत्म हो चुकी है। इन कानूनों का आधार, यानी जनसंख्या अधिक होने का डर, पिछले कुछ दशकों में आए जनसांख्यिकीय बदलावों के कारण अब पूरी तरह से खत्म हो गया है।’’

पीठ ने कहा कि 2.1 कुल प्रजनन दर, जिसे 'प्रतिस्थापन दर' कहा जाता है, एक पीढ़ी को खुद को पूरी तरह से प्रतिस्थापित करने में सक्षम बनाती है।

शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘इसलिए, भले ही भारत की जनसंख्या अभी घट नहीं रही हो, लेकिन कुल प्रजनन दर के प्रतिस्थापन दर से नीचे चले जाने के कारण जल्द ही एक ऐसा जनसांख्यिकीय बदलाव आएगा, जिसमें बुजुर्गों की संख्या बढ़ती जाएगी और कामकाजी उम्र के लोगों की हिस्सेदारी कम हो जाएगी।’’

पीठ ने कहा, ‘‘अगर हम इस तरह के जनसांख्यिकीय बदलावों पर ध्यान नहीं देते हैं, तो भारत को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे। न्याय हासिल करने के लिए बदलाव के अनुरूप ढलना जरूरी है, क्योंकि ऐसा न कर पाना अन्याय को जन्म देता है।’’

न्यायालय ने कहा कि 2003 के फैसले में एक ‘‘पूरी तरह से मनमाने कदम’’ को सही ठहराने के लिए जो तर्क दिए गए थे, वे भी उतने ही चिंताजनक हैं।

पीठ ने कहा कि ऐसे कानूनों को बने रहने देने का मतलब है नागरिकों के एक पूरे वर्ग को राजनीतिक प्रतिनिधित्व से बाहर रखना, जबकि इसके लिए दिए गए आधार का सार्वजनिक पद संभालने से कोई तार्किक संबंध नहीं है।

पीठ ने कहा कि यह महिलाओं के बच्चे को जन्म देने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सा लेने के बीच एक बेहद अनुचित चयन करने के लिए मजबूर करता है, जो अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले प्रजनन स्वायत्तता के अधिकार का उल्लंघन है।

न्यायालय ने कहा कि देश की जनसंख्या के आंकड़े बड़े बदलावों का संकेत देते हैं।

पीठ ने कहा, ‘‘भारत की बदलती जनसंख्या वृद्धि दर के नतीजों को सिर्फ इसलिए नजरअंदाज कर देना कि देश की पहले से बहुत बड़ी आबादी है, खतरनाक रूप से लापरवाह कदम होगा - क्योंकि इसमें बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है।’’

शीर्ष अदालत ने कहा कि वक्त की दरकार है कि नीतियां वर्तमान वास्तविकताओं के अनुरूप हों।

पीठ ने कहा, ‘‘हमें प्रजनन क्षमता में आने वाली ऐसी गिरावट को रोकना होगा जिसे शायद बाद में ठीक न किया जा सके, और बदलती जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं के अनुसार कदम उठाने होंगे।’’

न्यायालय ने कहा कि ऐसा लगता है कि जनसंख्या नियंत्रण के कई वर्षों के उपायों और विकास प्रयासों के परिणाम उम्मीद से कहीं अधिक तेजी से सामने आए हैं।

पीठ ने कहा, ‘‘बहुत जल्द, हमें आबादी में बुजुर्गों की अधिक संख्या से पैदा होने वाली चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है...दुनिया भर के अनुभव हमें चेतावनी देते हैं कि आबादी में इस तरह की बढ़ोतरी के नुकसानदेह परिणाम हो सकते हैं।’’

न्यायालय ने उल्लेख किया कि चीन ने 2015 में अपनी 'एक-बच्चे की नीति' को छोड़ दिया और दो बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहन देने की दिशा में कदम बढ़ाया। ऐसा उसने अपनी जनसंख्या संरचना में सुधार करने, श्रम आपूर्ति बढ़ाने और वृद्धों की बढ़ती आबादी की समस्या से निपटने की जरूरत को समझते हुए किया।

पीठ ने कहा कि 2021 में इस नीति को और उदार बनाते हुए तीन बच्चे पैदा करने की अनुमति दे दी गई। साथ ही, पहले लागू किए गए प्रतिबंधों या हतोत्साहित करने वाले उपायों को हटा दिया गया और बच्चों के जन्म को बढ़ावा देने के लिए कई सकारात्मक कदम उठाए गए। इनमें बच्चों की देखभाल, शिक्षा, मातृत्व सुरक्षा और परिवार कल्याण के लिए सहायता शामिल है।

शीर्ष अदालत ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि वह उसके फैसले को प्रधान न्यायाधीश के समक्ष रखे, ताकि एक उपयुक्त पीठ का गठन किया जा सके।

शीर्ष अदालत ने पूर्व में याचिका पर नोटिस जारी करते समय, इस मामले में मुंबई उच्च न्यायालय के पिछले साल अगस्त के फैसले पर रोक लगा दी और अपीलकर्ता को सरपंच के पद पर बने रहने की अनुमति दी थी।

न्यायालय ने कहा, ‘‘यह अंतरिम आदेश दीवानी अपील के निस्तारण तक लागू रहेगा।’’

भाषा सुभाष नरेश

नरेश