नयी दिल्ली, तीन नवंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को व्यवस्था दी कि वैवाहिक संबंधों में सुधार की कोई उम्मीद नहीं होने के आधार पर किसी विदेशी अदालत द्वारा दिया गया तलाक का आदेश कानूनी रूप से मान्य नहीं है।
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने एक व्यक्ति की उस याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की, जिसमें उसने अपने खिलाफ द्विविवाह और आपराधिक साजिश के तहत दर्ज मामले को रद्द करने की मांग की थी।
पीठ ने कहा, 'हमारी राय में, विदेशी तलाक की डिक्री भारत में मौजूदा वैवाहिक कानून के उल्लंघन में और एक ऐसे आधार पर पारित की गई थी जिसे कानूनन मान्यता भी नहीं प्राप्त है। यह न केवल सीपीसी की धारा 13 की कानूनी सीमा का उल्लंघन करता है, जिससे होकर हर विदेशी डिक्री को गुजरना पड़ता है, बल्कि भारत में लागू होने के लिए किसी विदेशी डिक्री द्वारा पूरी की जाने वाली शर्तों के संबंध में इस अदालत द्वारा की गई टिप्पणियों का भी उल्लंघन करता है।'
पीठ ने कहा, 'हम इस दलील को इस तरह से स्वीकार नहीं कर सकते क्योंकि आरोपी नंबर 1/पति की शादी भारत में हिंदू रीति-रिवाजों और परंपराओं के अनुसार प्रतिवादी नंबर 2/पहली पत्नी से हुई थी। इसलिए, भले ही दूसरी शादी भारत से बाहर हुई हो, भारतीय दंड संहिता की धारा 494 के तहत आरोपों को कमजोर नहीं माना जा सकता, क्योंकि द्विविवाह के अपराध की जांच केवल दूसरी शादी के स्थान तक सीमित नहीं हो सकती, बल्कि इसमें मौजूदा वैवाहिक संबंधों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।'
इस मामले में, व्यक्ति ने 18 अप्रैल 2003 को आंध्र प्रदेश के सत्तेनपल्ली में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार अपनी पहली पत्नी से शादी की थी। शादी के बाद वे हैदराबाद में रहे, जहां पति उस्मानिया मेडिकल कॉलेज से पीजी की पढ़ाई कर रहा था।
चार फरवरी 2005 को वह व्यक्ति डॉक्टर के रूप में अपना करियर बनाने के लिए ब्रिटेन चला गया और बाद में उसकी पत्नी भी वहां चली गई।
अगस्त 2007 में, पहली पत्नी अपनी संतान को जन्म देने के लिए सत्तेनपल्ली में अपने मायके लौट आई। व्यक्ति का दावा है कि बार-बार अनुरोध के बावजूद वह ब्रिटेन नहीं लौटी।
जैसे-जैसे दोनों पक्षों के वैवाहिक संबंध खराब होते गए, पति ने आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले के नरसा राव पेट की सक्षम अदालत में तलाक और बच्चे के संरक्षण की कार्यवाही शुरू की, जिसे खारिज कर दिया गया।
बाद में, उसने उच्च न्यायालय में एक अपील दायर की लेकिन बाद में इसे वापस ले लिया गया।
पति को 1 फरवरी 2013 को ब्रिटेन की नागरिकता मिल गई और उसने इंग्लैंड की कैम्ब्रिज काउंटी कोर्ट में पहली पत्नी के खिलाफ तलाक की कार्यवाही शुरू की और उस अदालत ने 2014 में तलाक का आदेश दे दिया।
भाषा वैभव अविनाश
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