नयी दिल्ली, तीन नवंबर (भाषा) भारत अपने सौर विनिर्माण उद्योग को 2047 तक पूरी तरह एकीकृत वैश्विक केंद्र में बदलकर 32.3 लाख प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रोजगार पैदा कर सकता है। इससे विनिर्माण क्षेत्र में 89 अरब डॉलर का निवेश भी आकर्षित हो सकता है। मंगलवार को जारी एक रिपोर्ट में यह अनुमान जताया गया।
भारतीय सौर विनिर्माता संघ (आईएसएमए) की ‘विजन 2047 : पॉलीसिलिकॉन से बिजली संयंत्र तक सौर विनिर्माण’ शीर्षक वाली रिपोर्ट में भारत के लिए केवल सौर मॉड्यूल जोड़ने से आगे बढ़कर पूरी सौर मूल्य श्रृंखला में विनिर्माण क्षमता विकसित करने का खाका पेश किया गया है। इसमें पॉलीसिलिकॉन और इंगोट से लेकर वेफर, सेल और मॉड्यूल तक का विनिर्माण शामिल है।
रिपोर्ट के अनुसार, इस बदलाव से भारत में निर्मित प्रत्येक सौर पैनल से पैदा होने वाले मूल्य का बड़ा हिस्सा देश में ही रह सकेगा और वैश्विक बाजारों में भारत की स्थिति मजबूत होगी।
रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि इस दृष्टिकोण के तहत 2047 तक भारत की स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता 2,275 गीगावाट तक पहुंच सकती है। इसके लिए मॉड्यूल की 3,266 गीगावाट, सेल की 2,796 गीगावाट, इंगोट और वेफर की 2,479 गीगावाट तथा पॉलीसिलिकॉन की 2,156 गीगावाट के बराबर विनिर्माण क्षमता विकसित करनी होगी।
इस विस्तार से रोजगार के बड़े अवसर पैदा हो सकते हैं। सौर विनिर्माण से जुड़े कुल रोजगार मौजूदा करीब 4.1 लाख से बढ़कर 2030 तक 8.1 लाख और 2047 तक 32.3 लाख हो सकते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए 2047 तक सौर फोटोवोल्टिक (पीवी) विनिर्माण में करीब 89 अरब अमेरिकी डॉलर के नए निवेश की जरूरत होगी। इसके लिए 2027 से 2047 के बीच हर साल औसतन करीब 4.3 अरब डॉलर का निवेश करना होगा।
आईएसएमए के महासचिव अमित मनोहर ने कहा, ‘‘इस महत्वाकांक्षा को साकार करने के लिए निरंतर नीतिगत समर्थन, मांग की स्पष्ट संभावना, शुरुआती चरण के विनिर्माण में निवेश और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत की स्थिति मजबूत करने के प्रयास जारी रखने की जरूरत होगी।’’
भाषा यासिर प्रेम
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