मुंबई, तीन नवंबर (भाषा) महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे ने मंगलवार को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ अभियान पर तंज कसते हुए कहा कि भाजपा सत्ता में होने के बावजूद “विपक्षी पार्टी वाली मानसिकता” से बाहर नहीं निकल पाई है।
ठाकरे ने पिछले महीने विधान परिषद चुनाव के नतीजों की घोषणा के बाद कांग्रेस पर कटाक्ष करने वाले एक सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना भी की। उन्होंने कहा कि सत्ता में बैठे लोगों को हर राजनीतिक घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए।
मनसे प्रमुख ने मुंबई में एक कार्यक्रम के दौरान कहा, “भाजपा अब भी विपक्ष वाली मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाई है, जबकि कांग्रेस को अब तक यह समझ नहीं आया है कि एक विपक्षी दल को कैसे काम करना चाहिए। उसे (कांग्रेस) (सत्ता से हटने के ) पांच साल बाद इस बात का एहसास होना शुरू हुआ।”
ठाकरे ने सवाल उठाया कि एक सत्ताधारी पार्टी ‘लोकतंत्र बचाओ’ विरोध-प्रदर्शन कैसे कर सकती है।
उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि संविधान को बचाने का भाजपा का आह्वान ‘केएफसी’ के ‘लोगो’ वाले बुजुर्ग व्यक्ति के लोगों से मुर्गियों को बचाने की अपील करने जैसा है।
प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले महीने विधान परिषद चुनाव में मतपत्र से मतदान के बावजूद खराब प्रदर्शन को लेकर कांग्रेस पर कटाक्ष किया था। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के खिलाफ विपक्षी दलों के अभियान में मतपत्र से मतदान कराना एक प्रमुख मांग है।
हालांकि, बाद में रुझान बदल गए और कांग्रेस नागपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में जीत हासिल करने में कामयाब रही।
ठाकरे ने कहा कि उन्हें याद नहीं है कि इससे पहले किसी प्रधानमंत्री ने विपक्ष को निशाना बनाते हुए इस तरह की टिप्पणी की हो।
महाराष्ट्र की एक राजनीतिक घटना का उदाहरण देते हुए मनसे प्रमुख ने याद किया कि शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने एक बार जाने-माने मराठी लेखक पीएल देशपांडे की ओर से उनकी कार्यशैली की आलोचना किए जाने के बाद किस तरह प्रतिक्रिया दी थी।
‘महाराष्ट्र भूषण पुरस्कार’ प्राप्त करने वाले पहले व्यक्ति देशपांडे ने लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के बजाय बाहुबल (ठोकशाही) के इस्तेमाल पर असहमति जताई थी।
इस पर बाल ठाकरे ने पलटवार करते हुए कहा था कि राज्य की तत्कालीन शिवसेना-भाजपा सरकार ने उन्हें सम्मानित करके गलती की है और अगर देशपांडे को शिवसेना के तौर-तरीकों पर आपत्ति थी, तो उन्हें यह पुरस्कार स्वीकार नहीं करना चाहिए था।
मनसे प्रमुख ने कहा कि उस समय उनके चाचा बाल ठाकरे की प्रतिक्रिया भी विपक्षी दल वाली मानसिकता की उपज थी।
भाषा पारुल दिलीप
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