(फाइल फोटो के साथ)
नयी दिल्ली, तीन नवंबर (भाषा) केंद्र सरकार ने दिल्ली उच्च न्यायालय से कहा है कि कृषि भवन परिसर में स्थित सौ साल पुरानी मस्जिद को हटाना जरूरी है क्योंकि केंद्र सरकार के कार्यालय परिसर में स्थायी धार्मिक ढांचे का निर्माण करना या उसे बनाए रखना स्वीकार्य नहीं है और यह सरकारी संपत्ति के ‘‘धर्मनिरपेक्ष’’ स्वरूप के अनुरूप भी नहीं है।
सरकार ने कहा कि ‘सेंट्रल विस्टा मास्टर प्लान’ के तहत भूखंड संख्या 120 पर ‘साझा केंद्रीय सचिवालय’ (सीसीएस) की इमारत संख्या चार और पांच का पुनर्विकास एवं पुनर्निर्माण किया जाना है। इस भूखंड में मौजूदा शास्त्री भवन और कृषि भवन शामिल हैं। इस परियोजना का उद्देश्य सरकारी कामकाज के लिए जरूरी बुनियादी ढांचे को आधुनिक बनाना है।
उसने कहा कि सीसीएस की इमारत संख्या चार और पांच का निर्माण राष्ट्रीय महत्व की एक अत्यंत महत्वपूर्ण सार्वजनिक परियोजना है। उसने कहा कि कदीमी मस्जिद इस परियोजना की जमीन पर स्थित है और परियोजना को पूरा करने के लिए इसे हटाना जरूरी है।
केंद्रीय आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले भूमि एवं विकास कार्यालय (एलएंडडीओ) ने उच्च न्यायालय में दाखिल एक हलफनामे में कहा, ‘‘कृषि भवन और केंद्रीय सचिवालय परिसर धर्मनिरपेक्ष सार्वजनिक परिसर हैं जिनका इस्तेमाल केवल सरकारी, प्रशासनिक एवं जनसेवा संबंधी कार्यों के लिए किया जाता है। केंद्र सरकार के कार्यालय परिसर में किसी स्थायी धार्मिक ढांचे का निर्माण करना, उसे बनाए रखना या ऐसे ढांचे की मांग करना स्वीकार्य नहीं है। यह सरकारी संपत्ति के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के भी अनुरूप नहीं है।’’
यह हलफनामा मस्जिद की देखरेख करने वालों की याचिका के जवाब में दाखिल किया गया है। याचिका में अनुरोध किया गया है कि कृषि भवन परिसर में स्थित वक्फ संपत्ति यानी कदीमी मस्जिद को बनाए रखने के मामले पर निष्पक्ष, पारदर्शी और तर्कसंगत तरीके से विचार किए बिना प्राधिकारियों को इसे गिराने, तोड़ने, हटाने या इसके स्वरूप में कोई बदलाव करने से रोका जाए।
सरकार ने कहा कि केंद्रीय प्रशासनिक क्षेत्र में स्थित सार्वजनिक भूमि के किसी हिस्से को स्थायी रूप से धार्मिक इस्तेमाल के लिए आरक्षित नहीं किया जा सकता।
हलफनामे में कहा गया, ‘‘यह उल्लेख करना जरूरी है कि नयी दिल्ली में इंडिया गेट के पास स्थित ‘शाही मस्जिद जाब्ता गंज’ कृषि भवन से दो किलोमीटर के दायरे में है। यह मस्जिद पूरी तरह चालू है और आसपास नमाज अदा करने की जगह तलाश रहे लोग वहां जा सकते हैं।’’
न्यायमूर्ति अनीश दयाल ने कदीमी मस्जिद की देखरेख करने वाली समिति की याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा था। इसी आदेश के तहत सरकार ने हलफनामा दाखिल किया है। मामले में अब 23 नवंबर को सुनवाई होगी।
केंद्र ने कहा कि मस्जिद यहां डॉ. राजेंद्र प्रसाद रोड स्थित कृषि भवन परिसर में है। उसने कहा कि यह सरकारी जमीन है, जिसका स्वामित्व और प्रशासनिक नियंत्रण भूमि एवं विकास कार्यालय के पास है।
सरकार ने कहा कि नवंबर 1940 में सरकार और जामा मस्जिद की प्रबंध समिति के सचिव के बीच एक समझौता हुआ था जिसके तहत संबंधित संपत्ति पर केवल मस्जिद के रूप में इस्तेमाल करने के सीमित उद्देश्य से कब्जे की अनुमति दी गई थी।
हलफनामे में कहा गया, ‘‘प्रतिवादी संख्या एक (केंद्र सरकार) जमीन का मालिक है और उसे कृषि भवन या केंद्रीय सचिवालय परिसर में उक्त मस्जिद के लिए अलग से कोई जगह आवंटित करने या आरक्षित रखने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।’’
इसमें कहा गया, ‘‘आठ नवंबर 1940 के समझौते के तहत प्रबंध समिति को केवल जमीन के इस्तेमाल और उस पर कब्जा रखने की अनुमति दी गई थी। इस समझौते से समिति को जमीन पर मालिकाना हक या कोई अन्य कानूनी अधिकार नहीं मिला था।’’
सरकार ने कहा कि परियोजना स्थल के किसी भी हिस्से को धार्मिक ढांचे के लिए आरक्षित करना मास्टर प्लान के अनुरूप नहीं होगा और यह सरकारी संपत्ति के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के भी विरुद्ध होगा।
केंद्र ने अपने जवाब में कहा कि इससे संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं होता, क्योंकि केवल इस्तेमाल की अनुमति मिलने के आधार पर किसी सरकारी जमीन के किसी खास स्थान पर पूजा-अर्चना का अधिकार नहीं मांगा जा सकता।
कदीमी मस्जिद कृषि भवन परिसर में स्थित सौ साल से अधिक पुरानी मस्जिद है। सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना के तहत कृषि भवन को गिराया जाना है।
भाषा सिम्मी अविनाश
अविनाश