नयी दिल्ली, तीन नवंबर (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने छह अक्टूबर के अपने उस आदेश पर अस्थायी रोक लगा दी है, जिसमें एक मामले में कथित तौर पर तथ्यात्मक रूप से गलत बयान देने के लिए सीबीआई के पांच पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ मजिस्ट्रेट अदालत के समक्ष झूठी गवाही की कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया गया था।
रोस्टर में बदलाव के बाद मामले की सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति मिनी पुष्कर्णा ने इसे अगले साल फरवरी के लिए टाल दिया।
उन्होंने कहा, ‘‘छह अक्टूबर 2026 के फैसले के पैराग्राफ 63 और 64 में दिए गए निर्देश, सुनवाई की अगली तारीख तक स्थगित रहेंगे।’’
न्यायमूर्ति पुष्कर्णा ने कहा कि ‘‘आवेदकों ने प्रथम दृष्टया मामला बना दिया है’’, सुविधा का संतुलन (बैलेंस ऑफ कन्वीनिएंस) भी आवेदकों के पक्ष में है, और यदि उनके पक्ष में अंतरिम आदेश पारित नहीं किया जाता है, तो ‘‘आवेदकों को अपूरणीय क्षति होगी।’’
'बैलेंस ऑफ कन्वीनिएंस' कानून का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है, जिसके तहत जब अदालत से कोई अस्थायी रोक मांगी जाती है, तो न्यायाधीश यह देखते हैं कि यदि रोक का आदेश दिया जाता है या नहीं दिया जाता है, तो किस पक्ष को अधिक नुकसान या असुविधा होगी।
सीबीआई के सेवानिवृत्त पुलिस उपाधीक्षक सुशील दीवान और रमन त्यागी ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। उन्होंने 6 अक्टूबर के उस आदेश को वापस लेने की मांग की है, जिसमें न्यायमूर्ति मधु जैन ने झूठी गवाही देने को लेकर उनके (दीवान और त्यागी) तथा सीबीआई के तीन अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही का आदेश दिया था।
आदेश को वापस लेने की अपनी याचिका में, दीवान ने आरोप लगाया था कि उन्हें अपील की प्रति, या आवेदक - पूर्व आईआरएस (भारतीय राजस्व सेवा) अधिकारी अशोक कुमार अग्रवाल - द्वारा दायर किसी अन्य दस्तावेज या दलीलों की प्रति नहीं दी गई।
इसमें यह भी आरोप लगाया गया कि अग्रवाल ने सुनवाई जल्दी कराने के लिए एक आवेदन दायर किया था, जिसकी जानकारी न तो उन्हें और न ही उनके वकील को उनके पते पर दी गई थी।
याचिका में आरोप लगाया गया है, ‘‘इसके बजाय, इसे जानबूझकर एक गलत ईमेल पते पर भेजा गया (इसके बारे में याचिकाकर्ता या उनके वकील स्पष्टीकरण दे सकते हैं), जो न तो कभी आवेदक/प्रतिवादी संख्या 1 का और न ही उनके वकील का था।’’
दीवान ने दलील दी कि उन्हें कोई नोटिस दिए बिना ही, उच्च न्यायालय ने 4 नवंबर को होने वाली सुनवाई की तारीख बदल कर 22 सितंबर को रख दिया, ‘‘उनकी गैर-मौजूदगी में अपील पर सुनवाई की, और उसी दिन मामले को फैसले के लिए सुरक्षित रख लिया।’’
उन्होंने आदेश को वापस लेने की मांग करते हुए कहा, ‘‘इसके अलावा, भले ही अपील में छह अधिकारियों के खिलाफ शिकायत दर्ज करने की मांग की गई थी, लेकिन केवल आवेदक/प्रतिवादी संख्या 1 को ही पक्षकार बनाया गया। बाकी पांच अधिकारियों को, जो इस मामले से जुड़े पक्षकार थे, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 341 के तहत अनिवार्य नोटिस कभी नहीं दिया गया।’’
यह मामला 2016 में सीबीआई के एक मामले से अग्रवाल को अमान्य मंजूरी के आधार पर आरोप मुक्त किए जाने से संबंधित है, जिसके बाद उन्होंने जब्त किए गए दस्तावेजों को वापस पाने के लिए आवेदन दायर किया था।
भाषा सुभाष दिलीप
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