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याचिकाकर्ता उच्च न्यायालयों में मामलों के समान वर्गीकरण के मुद्दे पर ई-समिति को दे अर्जी: न्यायालय

नयी दिल्ली, तीन नवंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को एक याचिकाकर्ता को देश के सभी उच्च न्यायालयों में मामलों के नामकरण, पंजीकरण प्रक्रियाओं और न्यायिक शब्दावली में एकरूपता लाने के अनुरोध को लेकर एक अभ्यावेदन उसकी ई-समिति को सौंपने की अनुमति दे दी।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ ने कहा कि मामलों के वर्गीकरण का मानकीकरण पहले से ही न्यायिक डेटा तक पहुंच बेहतर बनाने के लिए शीर्ष अदालत की ई-समिति की पहल का हिस्सा है।

उसने इस मुद्दे पर अश्विनी उपाध्याय की ओर से दायर जनहित याचिका (पीआईएल) पर न्यायिक पक्ष से विचार करने से इनकार कर दिया।

हालांकि, पीठ ने उपाध्याय को अपनी याचिका को शीर्ष अदालत की ई-समिति के समक्ष एक अभ्यावेदन के रूप में पेश करने की अनुमति दे दी।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने विभिन्न उच्च न्यायालयों में मामलों के वर्गीकरण और नामकरण में काफी अंतर होने की बात रेखांकित की। उन्होंने कहा कि एक ही उच्च न्यायालय की अलग-अलग पीठों में भी इस संबंध में भिन्नताएं हैं।

उपाध्याय ने कहा कि इस तरह की विसंगतियां न्यायिक रिकॉर्ड की पहचान करने, उन पर नजर रखने और उन्हें खोजने में कठिनाइयां पैदा करती हैं।

उन्होंने मामले दर्ज करने की प्रक्रिया में अंतर की ओर इशारा करते हुए कहा कि कुछ उच्च न्यायालयों में रिट याचिका को ‘डब्ल्यूपी’ कहा जाता है, जबकि कुछ में इसे ‘डब्ल्यूपीए’ कहा जाता है।

उपाध्याय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की मुख्य पीठ और लखनऊ पीठ के बीच अंतर का भी जिक्र किया।

न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि मामलों के नामकरण में एकरूपता का मुद्दा प्रासंगिक है, लेकिन उन्होंने बताया कि ई-समिति ने मानकीकरण की एक व्यापक पहल के हिस्से के रूप में पहले ही इस मामले को अपने हाथ में ले लिया है।

न्यायमूर्ति बागची ने कहा, “आप जो मुद्दा उठा रहे हैं, वह बहुत प्रासंगिक है। लेकिन यह पहले से ही एकरूपता परियोजना का हिस्सा है, जो एक तरह की समान न्यायिक संहिता है। इससे हमें एनजेडीजी (राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड) पर डेटा को बेहतर तरीके से खोजने में मदद मिलेगी।”

पीठ ने कहा कि जिला और मजिस्ट्रेट अदालतों में ‘केस इंफॉर्मेशन सिस्टम’ के जरिये मानकीकरण के प्रयास पहले ही शुरू किए जा चुके हैं और इस प्रक्रिया का आगे भी विस्तार किया जा रहा है।

उपाध्याय ने अदालत का ध्यान इस बात की ओर भी दिलाया कि अलग-अलग उच्च न्यायालयों में मामलों की श्रेणियों की संख्या अलग-अलग है।

याचिका के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय में 238 श्रेणी के मामले हैं, जबकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के संबंध में यह संख्या 132 है।

‘एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड’ अश्वनी दुबे के माध्यम से दायर याचिका में अलग-अलग राज्यों में समान कार्यवाही के लिए वसूले जाने वाले अदालती शुल्क में भारी अंतर की ओर भी ध्यान आकर्षित किया गया है।

याचिकाकर्ता ने कहा कि इस तरह के अंतर से वादियों के बीच असमानता पैदा होती है, लिहाजा एक समान व्यवस्था की जरूरत है।

हालांकि, पीठ ने कहा कि अदालती शुल्क राज्यों के विधायी अधिकार क्षेत्र में आता है और चूंकि अलग-अलग क्षेत्रों के वादियों की आर्थिक स्थिति में अंतर होता है, इसलिए एक समान शुल्क ढांचा शायद उचित न हो।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, “यहां तक कि अदालती शुल्क भी हर राज्य में अलग-अलग हो सकता है। दिल्ली के किसी निवासी की अदालती शुल्क चुकाने की क्षमता बिहार या ओडिशा के निवासी की तुलना में अधिक हो सकती है। हम गरीब लोगों पर उतना ही अदालती शुल्क नहीं थोप सकते, जितना बड़े शहरों में रहने वाले लोग आसानी से चुका सकते हैं।”

न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि अदालत उन मामलों में राज्य विधानमंडल पर प्रतिबंध नहीं लगा सकती, जो उनके विधायी अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं।

जनहित याचिका में सभी उच्च न्यायालयों और उनकी संबंधित पीठों के लिए एक समान न्यायिक संहिता बनाने का अनुरोध किया गया था।

इसमें विधि आयोग को यह निर्देश देने का आग्रह किया गया था कि वह शीर्ष अदालत और उच्च न्यायालयों के साथ परामर्श करके एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करे। यह रिपोर्ट अदालती शुल्क, केस पंजीकरण प्रक्रियाओं, न्यायिक शब्दावली, संक्षिप्त रूपों और वर्गीकरण के मानदंडों को एक समान बनाने के संबंध में होनी चाहिए।

भाषा पारुल माधव

माधव