नयी दिल्ली, 10 सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को स्पष्ट कर दिया कि वह दिल्ली में हाल ही में छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की ज्यादतियों और पुलिसकर्मियों के खिलाफ हिंसा के आरोपों की जांच के लिए पूर्व न्यायाधीश आर. सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय उच्चाधिकार समिति के पुनर्गठन में किसी भी बदलाव के लिए सहमत नहीं होगा।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि वह इस धारणा के आधार पर आगे नहीं बढ़ेगी कि उसके द्वारा बनाई गई समिति पूर्वाग्रह से ग्रसित है।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘समिति हमारा ही एक हिस्सा है। हम किसी भी बदलाव के लिए सहमत नहीं होंगे। यह समिति उच्चतम न्यायालय की देखरेख में काम करेगी। हम इसे दोबारा गठित नहीं करेंगे। इस समिति को काम करने दें, फिर देखेंगे। हम भाग नहीं रहे हैं। अगर किसी को लगता है कि समिति ने कहीं कोई गलती की है, तो हमें बताएं। हम खुली सुनवाई करेंगे।’’
सुनवाई के दौरान, समिति के पुनर्गठन की मांग करने वाले याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश हुए वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि समिति के सदस्यों में से एक, जो पूर्वोत्तर राज्य के पूर्व पुलिस महानिदेशक थे, ‘‘हितों के टकराव’’ की स्थिति में थे क्योंकि वह एक ऐसे उच्च अधिकारी के करीबी दोस्त हैं जिनकी जांच होने की संभावना थी।
वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने भी भूषण की बात का समर्थन किया।
शंकरनारायणन ने कहा, ‘‘हमारी पहली मांग यह है कि चूंकि उच्चाधिकार प्राप्त समिति को स्वतंत्र रूप से काम करना है, इसलिए उसका अपना अलग न्याय मित्र और 'एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड' होना चाहिए। समिति का प्रतिनिधित्व सरकारी वकील के जरिए नहीं किया जा सकता।’’
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इन दलीलों का विरोध किया और शीर्ष अदालत से कहा कि वह ऐसे आरोपों को नजरअंदाज करे।
मेहता ने कहा, ‘‘उनके अनुसार, एक-दो लोगों को छोड़कर पूरा देश ही बेईमान है।’’
प्रधान न्यायाधीश ने वकीलों से कहा कि मेघालय के सेवानिवृत्त डीजीपी को इसलिए समिति में चुना गया था क्योंकि वह पूर्वोत्तर राज्य के महानिदेशक थे, और इसलिए इस बात की संभावना कम थी कि वह देश के शेष हिस्से की राजनीतिक पार्टियों के करीबी हों।
पीठ ने कहा कि वह एक आदेश जारी करेगी जिसके तहत एक सार्वजनिक सूचना जारी की जाएगी और उस पर जनता से प्रतिक्रिया मांगी जाएगी।
वकीलों द्वारा समिति के पुनर्गठन के लिए जोर देने पर, न्यायमूर्ति बागची ने कहा, ‘‘हम उस सदस्य के बारे में आपकी आपत्तियों पर विचार करेंगे। लेकिन यह कहना कि इस न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली और हमारे द्वारा चुनी गई समिति के किसी सदस्य के बारे में पहले से ही पक्षपाती होने का शक किया जाए, यह बात हमें मंजूर नहीं है।’’
मेहता ने न्यायालय को यह भी बताया कि ग्रेटर नोएडा कार्यपालक मजिस्ट्रेट को निलंबित कर दिया गया है, जिन्होंने कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के नेतृत्व में जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने वाले एक छात्र को कारण बताओ नोटिस जारी किया था।
इससे पहले, न्यायालय ने हाल में दिल्ली में छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की ज्यादती और पुलिसकर्मियों के खिलाफ हिंसा के आरोपों की जांच के लिए उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति रेड्डी की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय उच्चाधिकार प्राप्त समिति बनाई थी।
भाषा सुभाष नरेश
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