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उप्र के मौजूदा एवं पूर्व विधानमंडल सदस्यों की पेंशन को चुनौती देने वाली याचिका पर न्यायालय का नोटिस

नयी दिल्ली, 10 सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को उत्तर प्रदेश सरकार और अन्य से उस याचिका पर जवाब मांगा, जिसमें 1980 के एक कानून के कुछ प्रावधानों की वैधता को चुनौती दी गई है। इस कानून में राज्य के मौजूदा और पूर्व विधायकों एवं विधानपरिषद सदस्यों के लिए पेंशन एवं अन्य सुविधाओं का प्रावधान है।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ उस याचिका पर सुनवाई करने के लिए सहमत हो गई, जिसमें इस साल मई में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के एक फैसले को चुनौती दी गई थी।

उच्च न्यायालय ने उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें उत्तर प्रदेश राज्य विधानमंडल (सदस्यों के वेतन-भत्ते और पेंशन) अधिनियम, 1980 के कुछ प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी।

उच्च न्यायालय ने कहा था कि ये नियम मौजूदा और पूर्व विधायकों एवं विधानपरिषद सदस्यों को वेतन, कई तरह के भत्ते और अन्य सुविधाओं का प्रावधान करते हैं। साथ ही, उनके जीवनसाथी और परिवार के सदस्यों को पारिवारिक पेंशन, मुफ़्त यात्रा, मेडिकल सुविधाएं और अन्य सुविधाएं भी देते हैं।

शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया और मामले की सुनवाई चार हफ्ते बाद के लिए निर्धारित कर दी।

याचिकाकर्ता 'लोक प्रहरी' ने उच्च न्यायालय में यह दलील देते हुए याचिका दायर की थी कि राज्य विधानसभा ने असल में खुद को ‘‘अपने ही मामले में न्यायाधीश’’ बना लिया है। उसने खुद को और अपने पूर्व सदस्यों को इस तरह से फायदे पहुंचाए हैं जो ‘‘स्पष्ट रूप से मनमाना’’ है और उस बुनियादी संवैधानिक सिद्धांत के खिलाफ है जिसके अनुसार सार्वजनिक पद जनसेवा के लिए होता है, न कि निजी फायदे के लिए।’’

उच्च न्यायालय ने कहा था, ‘‘रिट याचिकाकर्ता की मुख्य शिकायत यह है कि ये सभी प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 195 के तहत मिली सीमित शक्तियों से कहीं आगे जाते हैं। यह अनुच्छेद केवल 'सदस्यों' के 'वेतन और भत्तों' की बात करता है और इसमें पेंशन, सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले लाभ, परिवार/साथी के लिए सुविधाओं या 'अन्य सुविधाओं' का कोई जिक्र नहीं है।’’

संविधान का अनुच्छेद 195 राज्य विधानसभा और विधानपरिषद के सदस्यों के वेतन और भत्तों से संबंधित है।

भाषा सुभाष सुरेश

सुरेश