नयी दिल्ली, सात सितंबर (भाषा) पर्यावरणविदों और कार्यकर्ताओं के एक समूह ने उच्चतम न्यायालय द्वारा अरावली उच्चाधिकार प्राप्त समिति (एचपीसी) की अंतिम रिपोर्ट सौंपने के लिए समयसीमा छह महीने बढ़ाने से इनकार किए जाने पर सोमवार को चिंता जताई। उनका कहना है कि इस पर्वत श्रृंखला के व्यापक आकलन के लिए और अधिक समय की आवश्यकता होगी।
उच्चतम न्यायालय ने उस समिति को 30 नवंबर तक अंतिम रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया, जो अरावली पर्वत श्रृंखला की परिभाषा और सीमांकन पर केंद्र की रिपोर्ट की स्वतंत्र समीक्षा कर रही है। अदालत ने चेतावनी दी कि ऐसा नहीं किए जाने पर समिति का पुनर्गठन किया जाएगा।
अरावली विरासत जन अभियान के सह-संस्थापक दीवान सिंह ने एक बयान में कहा, ‘‘उच्चतम न्यायालय इतनी जल्दबाजी में क्यों है?’’
उन्होंने दावा किया कि अतीत की ‘‘गलतियों’’ को ‘‘दोहराया’’ जा रहा है।
अंतिम रिपोर्ट सौंपने की मूल समयसीमा 31 अगस्त थी। उस दिन उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित एचपीसी ने अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करके अदालत से समयसीमा बढ़ाकर 28 फरवरी, 2027 करने का अनुरोध किया था। समिति ने दलील दी थी कि अतिरिक्त समय से अरावली पर्वत श्रृंखला का ‘‘व्यापक और ठोस’’ आकलन करने में मदद मिलेगी।
प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने कहा, ‘‘समिति अरावली के मुद्दे पर रिपोर्ट सौंपने के लिए दिन-रात काम करे। यदि वे दो महीने में ऐसा करने में सक्षम नहीं हैं तो हम पूरी समिति का पुनर्गठन कर देंगे।’’
हालांकि, दीवान सिंह ने कहा कि ऐसी समीक्षा में जल्दबाजी नहीं की जानी चाहिए और उन्होंने पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ समिति का उदाहरण दिया।
उन्होंने कहा, ‘‘यह बहुत परेशान करने वाली बात है कि उच्चतम न्यायालय अपने ही आदेश से गठित एचपीसी के अनुरोध का सम्मान नहीं कर रहा और उसके सदस्यों के साथ स्कूली छात्रों जैसा व्यवहार कर रहा है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण की गंभीरता और सटीकता वाली रिपोर्ट तैयार करने के लिए समिति को दिन-रात काम क्यों करना चाहिए?’’
समिति ने अपनी अनुपालन रिपोर्ट में कहा था कि अरावली के ‘‘व्यापक भूवैज्ञानिक, भू-आकृतिक, जलवैज्ञानिक, जैव-भौगोलिक, पारिस्थितिक, जैव विविधता, खनिज संसाधन और सामाजिक-आर्थिक पहलुओं’’ का अध्ययन किया जाना आवश्यक है।
समिति के अनुसार, प्रस्तावित पद्धति-जिसे अरावली पारिस्थितिकी परिदृश्य (एईएल) ढांचा कहा गया है-अलग-अलग सामाजिक-परिवेशी विशेषताओं वाले क्षेत्रों की पहचान करने और संरक्षण एवं प्रबंधन के लिए अलग-अलग रणनीतियां तैयार करने में मदद कर सकती है।
सिंह ने कहा, ‘‘इन सभी चीजों के लिए समय चाहिए और निश्चित रूप से इनमें जल्दबाजी नहीं की जानी चाहिए। पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ समिति ने पश्चिमी घाट को ‘पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र’ घोषित करने की सिफारिश करने से पहले एक साल का समय लिया था और एक व्यवस्थित प्रक्रिया अपनाई थी। अरावली भी इससे कम की हकदार नहीं है।’’
संरक्षणवादी नीलम अहलूवालिया ने कहा कि समिति के अध्ययन में अरावली पर्वत श्रृंखला के सभी 64 जिलों को शामिल करना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि इनमें भारतीय वन सर्वेक्षण की 22 सितंबर, 2025 की रिपोर्ट के अनुसार गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली के 63 जिले शामिल हैं तथा मथुरा का एक अतिरिक्त जिला भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा, ‘‘समिति को केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के नेतृत्व वाले पैनल की रिपोर्ट के आधार पर आगे नहीं बढ़ना चाहिए, जिसमें अरावली के केवल 37 जिलों का उल्लेख किया गया था। इसमें राजस्थान के चित्तौड़गढ़, सवाई माधोपुर, भरतपुर, बूंदी और कई अन्य प्रमुख अरावली जिलों को छोड़ दिया गया था।’’
भील आदिवासी नेता साधना मीणा ने एक बयान में कहा कि ग्रामीण समुदायों तक पहुंचने के लिए अधिक समावेशी दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है, क्योंकि वे अरावली परिदृश्य के सबसे महत्वपूर्ण हितधारकों में से एक हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘अरावली समिति द्वारा सभी 64 जिलों में उप-जिला स्तर पर, या कम से कम जिला स्तर पर प्रभावी जन परामर्श किया जाना और लोगों को पर्याप्त पूर्व सूचना देना न्यूनतम आवश्यकता है।’’
यह मामला अरावली क्षेत्र में खनन गतिविधियों से संबंधित उच्चतम न्यायालय के 20 नवंबर, 2025 के फैसले से शुरू हुआ था। तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश बी. आर. गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने खनन गतिविधियों को नियंत्रित करने के उद्देश्य से अरावली की पहाड़ियों और पर्वत श्रृंखला की पहचान के लिए एक विशेषज्ञ समिति द्वारा सुझाए गए ऊंचाई आधारित मानदंड को मंजूरी दी थी।
अदालत द्वारा स्वीकार किए गए इस मानदंड के तहत अरावली जिलों में किसी भू-आकृति को अरावली पहाड़ी तभी माना जाना था, जब वह आसपास के स्थानीय भू-भाग से कम से कम 100 मीटर ऊंची हो। ऐसी दो या अधिक पहाड़ियों को, जो एक-दूसरे से 500 मीटर की दूरी के भीतर हों, अरावली पर्वत श्रृंखला का हिस्सा माना जाना था।
अदालत ने मुख्य और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में खनन पर प्रतिबंधों का समर्थन किया था, लेकिन पूरी तरह प्रतिबंध लगाने से परहेज किया था। उसका तर्क था कि पूर्ण प्रतिबंध से अवैध खनन को बढ़ावा मिल सकता है और ऐसी गतिविधियों का अपराधीकरण हो सकता है जिन्हें अन्यथा नियंत्रित किया जा सकता है।
बाद में इस परिभाषा की व्यापक आलोचना हुई। पर्यावरणविदों और अन्य हितधारकों ने दलील दी कि ऊंचाई आधारित मानदंड अरावली के एक बड़े हिस्से को कानूनी संरक्षण से बाहर कर सकता है।
आशंका जताई गई कि क्षेत्र का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा प्रभावी रूप से सुरक्षा उपायों के दायरे से बाहर हो सकता है और खनन के प्रति संवेदनशील हो सकता है।
विवाद के बीच शीर्ष अदालत ने इस मुद्दे पर दोबारा विचार किया। 29 दिसंबर, 2025 को सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने 20 नवंबर के फैसले पर रोक लगा दी और पूर्व विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के क्रियान्वयन को निलंबित कर दिया।
एक आदेश के माध्यम से गठित समिति अरावली की परिभाषा और सीमांकन पर केंद्र की रिपोर्ट की स्वतंत्र समीक्षा कर रही है।
भाषा अमित रंजन
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