(भास्कर मुखर्जी)
नयी दिल्ली, सात सितंबर (भाषा) दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के सत्य निकेतन में पांच मंजिला इमारत ढहने के बाद मलबे में फंसे लोगों को बचाने का काम कितना चुनौतीपूर्ण था, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि बचावकर्मियों को तंग गलियों में भारी उपकरणों के साथ कंक्रीट के ऊंचे-ऊंचे स्लैब को तेजी से हटाकर बचे हुए लोगों तक पहुंचना था। जैसे ही कोई खाली जगह मिलती, उन्हें अपनी रफ्तार धीमी करनी पड़ती, यह सोचते हुए कि कहीं वहां कोई जीवित व्यक्ति मदद का इंतजार तो नहीं कर रहा।
बचाए गए लोगों को अस्पताल तक पहुंचाने का काम भी बेहद पेचीदा था। पूरे अभियान के दौरान बचावकर्मियों को आसपास की इमारतों पर पैनी नजर रखनी पड़ी, जिनकी बुनियाद हादसे के बाद कमजोर पड़ जाने की आशंका थी। मौके पर एकत्र पीड़ितों के परिजन, दोस्तों और राजनीतिक दलों के नेताओं की भीड़ को नियंत्रित करना भी बेहद चुनौतीपूर्ण था।
दिल्ली विश्वविद्यालय के दक्षिण परिसर के पास स्थित इमारत रविवार दोपहर लगभग 1:30 बजे मरम्मत कार्य के दौरान ढह गई थी। इस इमारत में लड़कों के लिए पेइंग गेस्ट (पीजी) आवास का संचालन किया जा रहा था।
बचावकर्मियों ने घटना के लगभग 27 घंटे बाद सोमवार को शाम 5:10 बजे बचाव अभियान के खत्म होने की घोषणा की। उन्होंने बताया कि अभियान के दौरान मलबे से 12 लोगों को निकाला गया, जिनमें से सात की मौत हो गई।
अधिकारियों ने बताया कि सारा मलबा हटा दिया गया है और कोई अन्य शव नहीं बरामद हुआ है। उन्होंने बताया कि घटना की सूचना मिलने के बाद दिल्ली पुलिस के कर्मी सबसे पहले मौके पर पहुंचे।
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा, “कुछ ही मिनटों में दक्षिण परिसर थाने की एक टीम मौके पर पहुंच गई और इलाके की घेराबंदी शुरू कर दी। इस दौरान तंग गलियों में हजारों लोग जमा हो गए थे।”
अधिकारी के मुताबिक, सबसे बड़ी चुनौती ढही इमारत के चारों ओर एक सुरक्षित घेरा बनाना था और यह सुनिश्चित करना था कि बगल वाली इमारतों से कोई खतरा न हो।
उन्होंने कहा, “हमें यह सुनिश्चित करने के लिए क्षेत्र की घेराबंदी करनी पड़ी कि आसपास की इमारतों से जुड़ी कोई संरचनात्मक समस्या न हो। मलबे में फंसे लोगों की मदद के लिए अलग-अलग थानों से अतिरिक्त पुलिस दल बुलाए गए। कुछ स्थानीय लोग और आसपास मौजूद छात्र पहले ही मौके से मलबा हटाने का काम शुरू कर चुके थे।”
अधिकारी के अनुसार, दिल्ली अग्निशमन सेवा के कर्मियों को भी तुरंत घटनास्थल पर बुलाया गया। उन्होंने बताया कि हादसे की खबर फैलते ही इलाके में भीड़ बढ़ने लगी, जिसके चलते पुलिसकर्मियों को घेराबंदी का दायरा बढ़ाना पड़ा और लोगों को मलबे से पीछे धकेलने के लिए लगातार मशक्कत करनी पड़ी।
अधिकारी ने बताया कि इलाके में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस को अर्धसैनिक बलों को भी बुलाना पड़ा। उन्होंने बताया कि तंग गलियों में आपातकालीन वाहनों को भारी भीड़ से होकर मौके तक पहुंचना पड़ा, जबकि पुलिसकर्मी यह सुनिश्चित करने में जुटे रहे कि एंबुलेंस, दमकल की गाड़ियों और बचाव दलों के लिए रास्ता बना रहे।
एक अन्य अधिकारी ने बताया कि इलाके की घेराबंदी के बाद बचाव अभियान और अधिक चुनौतीपूर्ण चरण में पहुंच गया, जहां यह पता लगाने की कोशिश की जा रही थी कि लोग कहां फंसे हो सकते हैं और साथ ही कई टन मलबे को हटाना था।
उन्होंने बताया कि इमारत गिरने की सूचना मिलते ही दिल्ली अग्निशमन सेवा ने मौके पर दमकल की पांच गाड़ियां भेजीं।
दमकल विभाग के एक अधिकारी ने कहा, “हमने रोशनी की व्यवस्था की और कंक्रीट के मलबे को तुरंत हटाने के लिए जेसीबी और ‘अर्थमूवर’ मंगवाईं। लेकिन भारी मशीनों का इस्तेमाल हमेशा संभव नहीं था, क्योंकि ये कुछ ही मिनटों में बड़ी मात्रा में मलबा तो हटा सकती थीं, लेकिन इनके इस्तेमाल से अंदर फंसे लोगों को नुकसान पहुंचने का खतरा भी था।”
अधिकारी ने कहा कि बचावकर्मियों को जब भी अंदेशा हुआ कि मलबे के एक हिस्से के नीचे कोई व्यक्ति दबा हो सकता है, जेसीबी और ‘अर्थमूवर’ को तुरंत रोक दिया जाता था। उन्होंने बताया कि ऐसी स्थिति में अभियान बेहद सावधानी से संचालित किया जाता और बचावकर्मी धीरे-धीरे मलबा हटाते हुए पीड़ितों तक पहुंचने की कोशिश करते।
अधिकारी ने बताया, “जब हम उस जगह पर फंसे व्यक्ति को निकाल लेते या आश्वस्त हो जाते कि वहां कोई फंसा हुआ नहीं है, तो जेसीबी और ‘अर्थमूवर’ को फिर वहां बुलाते, ताकि अभियान को गति मिल सके।”
उन्होंने बताया कि दिन ढलने के बावजूद बचाव अभियान कृत्रिम लाइट के सहारे जारी रखा गया और इसमें तेजी लाने के राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (एनडीआरएफ) सहित अन्य बचाव एजेंसियों को बुलाना पड़ा।
भाषा पारुल अविनाश
अविनाश