नयी दिल्ली, सात सितंबर (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार को सत्य निकेतन में इमारत ढह जाने की घटना की उच्च स्तरीय एमसीडी जांच का आदेश दिया एवं स्पष्ट किया कि सरकार जिम्मेदारी से बच नहीं सकती है।
इस घटना में सात लोगों की जान चली गयी है।
उच्च न्यायालय ने इस घटना को ‘बेहद दुर्भाग्यपूर्ण’ करार देते हुए कहा कि ऐसी त्रासदियां दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) और अन्य प्रशासनों द्वारा किए गए अपर्याप्त उपायों का नतीजा हैं।
उच्च न्यायालय ने उन्हें बचाव प्रयासों को दोगुना करने का निर्देश दिया ताकि लोगों की जान बचाई जा सके।
मुख्य न्यायाधीश डी के उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की खंडपीठ ने कहा कि यह घटना न सिर्फ दुखद है, बल्कि इसने दिल्ली विश्वविद्यालय या सरकार द्वारा संचालित छात्रावासों समेत अपर्याप्त आवास सुविधाओं, विद्यार्थियों की सुरक्षा एवं ऐसे पीजी सुविधाओं के विनियमन के लिए दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) या अन्य संबंधित प्रशासन द्वारा पर्याप्त कदम नहीं उठाये जाने को लेकर कई गंभीर चिंताओं को भी जन्म दिया है।
खंडपीठ ने कहा,‘‘हमारी राय में प्रथम दृष्टया ऐसी घटनाओं के लिए ज़िम्मेदारी सिर्फ़ पीजी हॉस्टल के मालिक की नहीं है। बल्कि, यह ज़िम्मेदारी विश्वविद्यालय प्रशासन और एमसीडी की भी है। एमसीडी की यह ज़िम्मेदारी है कि वह यह सुनिश्चित करे कि दिल्ली में हर तरह का निर्माण कार्य—जैसे भवन निर्माण या मरम्मत वगैरह— भवन निर्माण नियमों या भवन विकास विनियमों का सख्ती से पालन करते हुए किया जाए।’’
विधि छात्र अनिकेत कुमार गुप्ता की जनहित याचिका पर केंद्र, दिल्ली सरकार, एमसीडी, दिल्ली पुलिस और एनएचआरसी को नोटिस जारी करते हुए उच्च नयायालय ये टिप्पणियां कीं।
इस जनहित याचिका में प्रभावित विद्यार्थियों के लिए तुरंत मेडिकल देखभाल और पुनर्वास, जान गंवाने लोगों के परिवारों को एक करोड़ रुपये की अनुग्रह राशि और हादसे से जुड़े अहम सबूतों को सुरक्षित रखने का अनुरोध किया गया है।
याचिका में सभी पीजी आवासों के संरचनात्मक ऑडिट का भी अनुरोध किया गया है।
उच्च न्यायालय ने संबंधित प्रशासनों को 10 दिनों के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया और मामले को 25 सितंबर के लिए सूचीबद्ध किया।
उच्च न्यायालय ने इस मामले में केंद्र, दिल्ली सरकार, दिल्ली पुलिस और एमसीडी की तरफ से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के आश्वासन का संज्ञान लिया। मेहता ने उच्च न्यायालय को भरोसा दिलाया कि मलबे में फंसे लोगों को बचाने के लिए हर संभव कोशिश की जा रही है।
उच्च न्यायालय ने कहा कि यह जनहित याचिका रविवार को सत्य निकेतन इलाके में हुई ‘बेहद दुखद घटना’ के बाद दायर की गई है।
उच्च न्यायालय ने कहा कि प्रभावित कई विद्यार्थियों को अस्पताल ले जाया गया है और माना जा रहा है कि बाकी विद्यार्थी अब भी मलबे के नीचे दबे हुए हैं और मदद एवं अपनी जान बचाने के लिए चिल्ला रहे हैं।
उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि एमसीडी को सबसे ऊंचे प्रशासनिक स्तर पर इस मामले को देखना चाहिए और जांच करवानी चाहिए कि क्या इस घटना में गिरी इमारतें किसी वैध अनुमति के तहत बनाई गई थीं या नहीं।
उच्च न्यायालय ने कहा , “अगर यह पाया जाता है कि इमारतें बिना सही मंज़ूरी के बनाई गई थीं, तो एमसीडी इस चूक के लिए ज़िम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करेगी।’’
खंडपीठ ने कहा, ‘‘एमसीडी एक रिपोर्ट भी तैयार करेगी जिसमें यह बताया जाएगा कि जिन इमारतों में पीजी आवास चल रहे हैं, क्या वे ज़रूरी मंज़ूरी के साथ बनाई गई हैं और क्या उन मंज़ूरियों या भवन निर्माण नियमों का कोई उल्लंघन हुआ है। रिपोर्ट में यह भी बताया जाएगा कि इन पीजी आवासों में कितने छात्र रह रहे हैं।”
खंडपीठ ने कहा कि डीयू अपने बाहरी विद्यार्थियों के लिए छात्रावास की पर्याप्त सुविधाएं नहीं देता है, जिसकी वजह से विद्यार्थी और उनके माता-पिता इन पीजी आवासों की ओर रूख के लिए मजबूर होते हैं।
उच्च न्यायालय ने एमसीडी को निर्देश दिया कि वह अपने हलफ़नामे में बताए कि क्या पीजी आवासों के विनियमन के लिए कोई सावंधिक या कार्यकारी विनियम हैं।
खंडपीठ ने डीयू से अपने जवाब में यह बताने को कहा कि उससे जुड़े महाविद्यालयों में कितने बाहरी विद्यार्थी दाखिला लेते हैं और उसके या सरकार द्वारा कितने छात्रावास चलाए जा रहे हैं।
खंडपीठ ने मेहता से कहा कि वह सरकार से विद्यार्थियों को छात्रावास की सुविधा देने के लिए कहें। विधि अधिकारी ने कहा कि यही इस घटना की मुख्य वजह लगती है।
भाषा
राजकुमार माधव
माधव