नयी दिल्ली, सात सितंबर (भाषा) पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री अश्वनी कुमार ने सोमवार को कहा कि पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति को लेकर खड़े हुए विवाद से बचा जाना चाहिए था, क्योंकि यह अंतर-संस्थागत और केंद्र-राज्य संबंधों पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।
कुमार ने एक बयान में कहा कि वैसे तो उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की प्रस्तावित नियुक्ति पर राज्य सरकारों की राय मांगी जाती है, लेकिन यह राय केंद्र या राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी नहीं होती है।
न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्रा ने पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के तौर पर सोमवार को शपथ ली।
इससे एक दिन पहले पंजाब की आम आदमी पार्टी (आप)-नीत सरकार ने मुख्य न्यायाधीश के तौर पर न्यायमूर्ति मिश्रा की नियुक्ति को लेकर केंद्र की अधिसूचना पर आपत्ति जताई थी। आप सरकार का आरोप है कि इस फैसले में संवैधानिक नियमों और तय प्रक्रियाओं को नजरअंदाज किया गया तथा उसकी राय का इंतजार नहीं किया गया।
कुमार ने बयान में कहा, ‘‘पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति को लेकर हुए विवाद से बचा जाना चाहिए था। इसका असर अंतर-संस्थागत एवं केंद्र-राज्य संबंधों पर बुरा पड़ता है।’’
पूर्व कानून मंत्री ने उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति से जुड़ी संवैधानिक स्थिति और स्थापित परंपराओं का जिक्र करते हुए कहा, ‘‘हालांकि संबंधित राज्य सरकारों से उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के तौर पर प्रस्तावित नियुक्तियों पर उनकी राय मांगी जाती है और उनकी राय की अहमियत भी होती है, लेकिन वह केंद्र सरकार या राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी नहीं होती है।’’
पूर्व कानून मंत्री ने कहा कि संबंधित राज्य सरकारों के साथ सलाह-मशविरा करने का मतलब यह नहीं है कि राज्य सरकार की सहमति जरूरी है।
उन्होंने यह भी कहा, ‘‘उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में संबंधित राज्य सरकार द्वारा अपनी राय रोककर रखने से उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की आपसी वरिष्ठता भी प्रभावित हो सकती है।’’
कुमार ने कहा कि जिस न्यायाधीश की नियुक्ति संबंधित राज्य सरकार से जवाब न मिलने के कारण टल जाती है, वह उसी बैच के उन न्यायाधीशों के मुकाबले अपनी वरिष्ठता खो सकते हैं, जिनकी नियुक्ति पहले हो जाती है।
उन्होंने कहा कि इससे उसी बैच के उन दूसरे न्यायाधीशों की नियुक्ति या वरिष्ठता में भी देरी हो सकती है, जिनकी नियुक्ति संबंधित राज्य सरकारों की राय मिलने तक रुक जाती है।
कुमार ने कहा, ‘‘यह स्पष्ट रूप से एक असंगति होगी और न्यायिक संस्थान के हित में इससे बचा जाना चाहिए।’’
न्यायमूर्ति मिश्रा (57) जून से ही इस उच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के तौर पर काम कर रहे थे।
पंजाब मंत्रिमंडल ने रविवार शाम एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें केंद्र से कहा गया था कि जब तक राज्य सरकार की चिंताओं का ठीक से समाधान नहीं हो जाता, तब तक न्यायमूर्ति मिश्रा को शपथ दिलाने की प्रक्रिया आगे न बढ़ाई जाए।
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सत्य पाल जैन ने कहा था कि नियुक्ति को लेकर पंजाब सरकार ने जो विवाद खड़ा किया है, वह ‘बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और पूरी तरह से अनावश्यक’ है।
उन्होंने कहा था कि राज्य सरकार के पास अपनी राय भेजने के लिए पर्याप्त समय था।
उन्होंने बताया कि उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम ने छह अगस्त को आठ उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए नामों की सिफारिश की थी।
जैन ने एक बयान में कहा, ‘‘पंजाब को छोड़कर सभी राज्य सरकारों ने एक हफ़्ते के अंदर अपनी राय भेज दी... किसी को भी न्यायिक प्रक्रिया को रोकने और एक ग़ैर-राजनीतिक मुद्दे का राजनीतिकरण करने के मकसद से प्रस्ताव को अनिश्चित काल तक रोके रखने का अधिकार नहीं है।’’
उन्होंने यह भी कहा कि इन नियुक्तियों पर राज्यों के पास ‘वीटो’ पावर नहीं है।
पंजाब के राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया ने सोमवार को यहां लोक भवन में न्यायमूर्ति मिश्रा को शपथ दिलाई। हालांकि, मुख्यमंत्री भगवंत मान इस समारोह में मौजूद नहीं थे।
न्यायमूर्ति मिश्रा का जुलाई 2025 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय से पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में तबादला किया गया था।
भाषा
राजकुमार सुरेश
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