नयी दिल्ली, पांच सितंबर (भाषा) प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने उच्चतम न्यायालय द्वारा आयोजित ‘ब्रिक्स प्रधान न्यायाधीश मंच’ को शनिवार को पारंपरिक धागों से बुना एक आधुनिक ताना-बाना बताया।
उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य ऐसे समाधान की तलाश करना है जो मानवता की सेवा करें और एक ऐसी दुनिया की परिकल्पना करें जहां कानून विकास की धारा को साझा समृद्धि के सागर की ओर ले जा सके।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने ब्रिक्स सदस्य देशों और सहयोगी देशों के प्रधान न्यायाधीशों, उच्चतम न्यायालय के अध्यक्षों और वरिष्ठ न्यायिक अधिकारियों की मौजूदगी में मंच के दूसरे दिन स्वागत भाषण देते हुए कहा, ‘‘हम केवल अलग-अलग अधिकार-क्षेत्रों का समूह नहीं हैं, बल्कि हम न्यायिक सोच रखने वालों का एक समुदाय हैं, जो इस साझा विश्वास से जुड़े हैं कि न्याय के स्थायी मूल्य हमारे समय की बदलती चुनौतियों का सामना कर सकते हैं।’’
उन्होंने प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए कहा कि संवैधानिक सिद्धांतों के संरक्षक और अपने देशों के सर्वोच्च आदर्शों के व्याख्याता के तौर पर, वे अंतरराष्ट्रीय कानूनी सहयोग के इतिहास में एक नया अध्याय लिखने के लिए यहां एकत्र हुए जुटे हैं और यह एक ऐसा अध्याय है जहां महान ज्ञान की विरासत आधुनिक कानून के वादे से मिलेगी।
उन्होंने कहा, ‘‘ब्रिक्स प्रधान न्यायाधीश मंच वास्तव में पारंपरिक धागों से बुना गया एक आधुनिक ताना-बाना है। अलग-अलग विषयों पर हमारी चर्चाओं का आधार और साझा उद्देश्य ऐसे समाधान खोजना है जो मानवता के काम आए... एक ऐसी दुनिया की परिकल्पना करना जहां कानून ऐसी सौम्य लेकिन अडिग धारा बन सके, जो विकास की नदी को साझा समृद्धि के सागर की ओर ले जाए।’’
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने प्राचीन भारत की विरासत और दुनिया के सबसे पुराने नालंदा विश्वविद्यालय के विशाल पुस्तकालय का उल्लेख करते हुए कहा कि इस विश्वविद्यालय में उन सभ्यताओं के विद्वान आते थे जिनका प्रतिनिधित्व इस कमरे में मौजूद लोग कर रहे हैं, जैसे तांग चीन से पैदल चलकर आए भिक्षु, और कोरिया, तिब्बत, फारस और दक्षिण-पूर्व एशिया से आए छात्र। ये सभी विशाल धर्मगंज पुस्तकालय परिसर में एकत्र होते थे, जिसके बारे में कहा जाता है कि वहां 90 लाख से अधिक पांडुलिपियां रखी हुई थीं।
उन्होंने कहा, ‘‘एक हजार साल से भी पहले, नालंदा बौद्धिक खोज का एक केंद्र था। यह एक ऐसी जगह थी जहां दूर-दूर से आए विद्वान एकत्र होकर ऐसे विचारों पर बहस करते, उनका आदान-प्रदान करते और उन्हें बेहतर बनाते थे, जो भूगोल और संस्कृति की सीमाओं से परे थे।’’
उन्होंने कहा कि नालंदा विश्वविद्यालय की असल खासियत यह थी कि वह अपने छात्रों को दाखिला देने से पहले कभी भी उनसे किसी एक कानून या दर्शन की व्यवस्था पर सहमत होने के लिए नहीं कहती थी।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, ‘‘इसने असहमति और विचार-विमर्श के लिए एक स्वस्थ और स्वागत-पूर्ण माहौल दिया।’’ उन्होंने कहा कि देशों के किसी भी समूह के विकास के रास्तों पर चर्चा करने के लिए साथ बैठने से सदियों पहले, भारत ने एक अधिक मुश्किल प्रयोग किया था, अलग-अलग विचारधाराओं को एक-दूसरे से सीधे जुड़ने के लिए एक साथ लाना, न कि केवल दूर से एक-दूसरे को देखना।’’
सीजेआई ने कहा, ‘‘ मेरा मानना है कि ब्रिक्स मंच जो करने की कोशिश कर रहा है, उसके लिए यह सबसे सही मिसाल है।’’
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, ‘‘ आर्थिक प्रगति, प्रौद्योगिकी, विवादों का निस्तारण और सतत ऊर्जा; इन सभी को ब्रिक्स और सहयोगी देशों को आगे बढ़ाने वाले इंजन के तौर पर देखा जाता है। मेरा मानना है कि ये चार अलग-अलग इंजन नहीं हैं जो साथ-साथ चल रहे हैं। ये सभी एक ही आधार पर टिके हैं, और वह आधार है - समय पर और भरोसेमंद तरीके से न्याय मिलना।’’
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने रेखांकित किया कि न्याय-वितरण प्रणाली के प्रतिनिधियों के तौर पर न्यायाधीशों की भूमिका, किसी इमारत में भार उठाने वाली दीवार जैसी होती है।
भाषा धीरज अविनाश
अविनाश