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ऐतिहासिक उत्सर्जन करने वाले देशों को कार्रवाई करनी होगी: यूएनईपी भारत प्रमुख

(अपर्णा बोस)

नयी दिल्ली, पांच सितंबर (भाषा) संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की नवीनतम रिपोर्ट स्पष्ट संदेश देती है कि दुनिया 1.5 डिग्री सेल्सियस वैश्विक तापमान वृद्धि की सीमा को पार करने के बेहद करीब पहुंच गई है और 50 वर्षों की प्रौद्योगिकी प्रगति भी जलवायु परिवर्तन को उलट नहीं सकती। संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के एक शीर्ष अधिकारी ने यह बात कही और चेतावनी दी कि ‘‘चीजें शायद फिर सामान्य स्थिति में ना लौटें।’’

यूएनईपी की बुधवार को जारी ‘बढ़ोत्तरी पर लगाम’ शीर्षक रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि आने वाले कुछ वर्षों में वैश्विक तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस की ताप वृद्धि सीमा को अस्थायी रूप से पार कर जाएगा।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इससे चरम मौसम की घटनाएं तेज हो सकती हैं, पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंच सकता है और छोटे द्वीपीय विकासशील देशों के जलमग्न होने का खतरा बढ़ सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इसमें ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में तत्काल और निरंतर कटौती का आह्वान किया गया है।

रिपोर्ट पर ‘पीटीआई-वीडियो’ से विशेष बातचीत में यूएनईपी के भारत प्रमुख बालकृष्ण पशुपति ने कहा कि नीतिगत और निवेश संबंधी फैसलों में उन बदलावों को ध्यान में रखना होगा जो स्थायी और दीर्घकालिक हैं। उन्होंने कहा कि कुछ बदलावों को अब भी पलटा जा सकता है, जबकि कुछ को नहीं और दुनिया के हर देश, समुदाय तथा व्यक्ति के लिए इस अंतर को समझना महत्वपूर्ण है।

पशुपति ने कहा, ‘‘दक्षिण एशिया कई परस्पर जुड़ी समस्याओं से जूझ रहा है—जनसांख्यिकीय दबाव, आय असमानता, प्रौद्योगिकी तक असमान पहुंच और न्यायसंगत बदलाव। कई विकासशील देशों की तरह दक्षिण एशिया भी मुख्य रूप से वैश्विक तापमान वृद्धि का खामियाजा भुगत रहा है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘इनमें से कई बदलाव राजनीतिक सीमाओं का सम्मान नहीं करते, यही वजह है कि हमारे पास बहुपक्षीय प्रक्रियाएं, वार्ताएं और संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय (यूएनएफसीसीसी) जैसे ढांचे हैं।’’

दक्षिण एशिया और अन्य क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण पहलुओं को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि कई जलवायु ‘‘घड़ियां’’ एक साथ चल रही हैं और प्रत्येक की अपनी गति तथा समय-सीमा है। इनमें गर्मी की घड़ी, ग्लेशियर की घड़ी, समुद्र स्तर की घड़ी, पारिस्थितिकी तंत्र की घड़ी और मानव जीवन की घड़ी शामिल हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘गर्मी की घड़ी को ही लें। जिस क्षण हम तापमान वृद्धि को कम करेंगे, उसका तत्काल असर देखने को मिल सकता है। लेकिन ग्लेशियर की घड़ी अलग है। अगर 100 साल बाद तापमान फिर 1.2 या 1.3 डिग्री सेल्सियस पर आ भी जाए, तो ग्लेशियर दोबारा उसी तरह नहीं बनेंगे और हिमचादरें 1800 या 1900 के दशक जैसी स्थिति में वापस नहीं आएंगी। ग्लेशियर इन बदलावों पर अन्य प्रणालियों से काफी हद तक स्वतंत्र रूप से प्रतिक्रिया करते हैं।’’

पशुपति ने कहा कि ‘‘समुद्र स्तर की घड़ी’’ अपेक्षाकृत तेज गति से चलती है और अगर तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित भी कर दिया जाए, तो एक दशक के भीतर इसके प्रभावों को पलटना ‘‘असंभव’’ होगा।

‘‘पारिस्थितिकी तंत्र की घड़ी’’ के बारे में उन्होंने कहा कि जैव विविधता का नुकसान स्थायी होता है और किसी प्रजाति के विलुप्त हो जाने के बाद उसे वापस नहीं लाया जा सकता। उन्होंने कहा कि सिंथेटिक बायोलॉजी और जैव प्रौद्योगिकी जैसे आधुनिक उपकरण अतीत के कुछ तत्वों को फिर से जीवित करने की उम्मीद जगाते हैं, लेकिन यह कभी भी पूरी तरह प्राकृतिक परिस्थितियों में नहीं होगा।

‘‘मानव जीवन की घड़ी’’ को समझाते हुए पशुपति ने भारत के कुछ हिस्सों के कृषक समुदायों का उदाहरण दिया, जहां सूखे और बाढ़ ने परिवारों को पहले ही पलायन करने तथा अपना पेशा बदलने के लिए मजबूर कर दिया है। उन्होंने कहा कि इससे उनके जीवन में ऐसे बदलाव आए हैं जिन्हें दशकों की पुनर्बहाली भी पूरी तरह नहीं बदल पाएगी।

उन्होंने कहा, ‘‘जैव विविधता का नुकसान वह क्षेत्र है जहां हमें स्थायी क्षति का सबसे बड़ा खतरा है। हम कुछ लाख नहीं बल्कि लाखों पौधों, जानवरों, सूक्ष्मजीवों, मछलियों के नाम जानते होंगे, लेकिन कई लाखों की अब भी पहचान नहीं हुई है और ज्ञात प्रजातियों में भी हम चिंताजनक दर से उन्हें खो रहे हैं।’’

उन्होंने कहा कि यह समस्या पूरी दुनिया में बनी हुई है, लेकिन इसका सबसे अधिक असर उन देशों पर पड़ता है जिनकी जलवायु परिवर्तन के लिए ऐतिहासिक जिम्मेदारी बहुत कम है, फिर भी वे इसके प्रभावों का सबसे अधिक सामना कर रहे हैं।

भाषा

अमित माधव

माधव