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असम: मध्यकाल की दुर्लभ पांडुलिपियों को समझने के लिए विशेषज्ञों की मदद लेगा प्रशासन

(त्रिदीप लहकर)

दीफू (असम), 14 जून (भाषा) असम के कार्बी आंगलोंग में मिली दुर्लभ पांडुलिपियों के भंडार में मध्यकाल के अनजाने रहस्य छिपे होने की संभावना है, इन लिपियों का अर्थ समझने पर उस क्षेत्र के इतिहास, संस्कृति और वहां के मूल ज्ञान को समझने में मदद मिल सकती है।

जिले के दो संग्रहालय में सुरक्षित रखे गए ये नाजुक पन्ने समय की मार झेलने के बाद भी बचे हुए हैं, लेकिन अभी तक पढ़े नहीं गए हैं। ये इतिहासकार और भाषाविदों का ध्यान खींच रहे हैं, जो ताड़ के पत्तों और तांबे की प्लेटों पर लिखी बातों के राज जानना चाहते हैं।

इनमें से दो ताई पांडुलिपियां, जिनमें ताड़ के पत्तों के क्रमशः 67 और 158 पन्ने हैं, कार्बी आंगलोंग के मुख्यालय दीफू स्थित जिला संग्रहालय में सुरक्षित रखी गई हैं। इन पर स्याही का इस्तेमाल नहीं किया गया है, बल्कि इन्हें पत्थर से उकेरा गया है।

तांबे की पांडुलिपि में तीन पन्ने, एक छल्ला और हाथी का निशान है। इस पांडुलिपि को नोधेंगपी कार्बी विरासत संग्रहालय में रखा गया है। यह संस्कृत भाषा में है, लेकिन इसकी लिपि असमिया है।

कार्बी आंगलोंग जिला प्रशासन जल्द ही ‘इंस्टिट्यूट ऑफ ताई स्टडीज एंड रिसर्च' (आईटीएसएआर) के विशेषज्ञों से संपर्क करके ताई भाषा की दो दुर्लभ पांडुलिपियों को समझने और इन बहुमूल्य पांडुलिपियों को केंद्र सरकार की ‘ज्ञान भारतम’ योजना में शामिल करने पर विचार कर रहा है।

कार्बी आंगलोंग जिले के आयुक्त अरण्यक सैकिया ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, ‘‘जिला संग्रहालय समृद्ध सांस्कृतिक और पुरातात्विक विरासत का खजाना है। यहां मध्यकाल की पांडुलिपियों का संग्रह है, जिनमें से कुछ को अभी पूरी तरह से समझा या पढ़ा नहीं जा सका है।’’

उन्होंने कहा कि माना जाता है कि इन पांडुलिपियों में अहोम युग के बारे में गहरी जानकारी मिलती है।

अहोम वंश ने 1228 से 1826 तक असम पर शासन किया था।

सैकिया ने कहा, ‘‘हमने इन ताई पांडुलिपियों का अध्ययन करने में रुचि रखने वाले किसी भी व्यक्ति को खुला निमंत्रण दिया था, लेकिन हमें अभी तक अच्छी प्रतिक्रिया नहीं मिली है। अब हम आईटीएसएआर से संपर्क करने और उन्हें इन दुर्लभ वस्तुओं का अध्ययन करने के लिए आमंत्रित करने के बारे में सोच रहे हैं।’’

साथ ही, जिला प्रशासन इन पांडुलिपियों को केंद्र सरकार की ‘ज्ञान भारतम’ योजना के तहत शामिल करने की कोशिश कर रहा है, ताकि भविष्य की पीढ़ियों के लिए इन्हें उचित तरीके से डिजिटल रूप से संरक्षित किया जा सके।

भाषा शफीक सुरेश

सुरेश

शफीक