भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पर्व जन्माष्टमी आज बड़े ही धूम-धाम से मनाया जा रहा है, हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को श्रीकृष्ण के जन्म की स्मृति में यह पर्व मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान कृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र में मध्यरात्रि के समय हुआ था। इसलिए जन्माष्टमी की पूजा में निशीथ काल का विशेष महत्व माना जाता है।
जन्माष्टमी के दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप यानी लड्डू गोपाल की पूजा करते हैं और उपवास रखते हैं। कुछ भक्त निर्जला व्रत रखते हैं, जबकि कई लोग फलाहार करके व्रत का पालन करते हैं। व्रत रखने से पहले अपनी क्षमता और स्वास्थ्य का ध्यान रखना जरूरी है।
जन्माष्टमी का व्रत कैसे रखें-
जन्माष्टमी व्रत को श्रद्धा, संयम और सात्विकता के साथ रखने की परंपरा है। व्रत रखने वाले श्रद्धालु सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। इसके बाद घर के मंदिर की साफ-सफाई करके भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप की मूर्ति या लड्डू गोपाल को सजाएं। दिनभर भगवान का स्मरण, भजन-कीर्तन और श्रीमद्भगवद्गीता या श्रीकृष्ण की कथा का पाठ किया जा सकता है।
व्रत में क्या खा सकते हैं-
व्रत रखने वाले लोग अपनी परंपरा के अनुसार फलाहार कर सकते हैं। आम तौर पर फल, दूध, दही, मखाना, साबूदाना और अन्य व्रत वाले सात्विक खाद्य पदार्थों का सेवन किया जाता है। कुछ श्रद्धालु निर्जला व्रत भी रखते हैं। हालांकि ऐसा व्रत अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर ही करना चाहिए।
पूजा विधि-
जन्माष्टमी की पूजा मुख्य रूप से रात के समय भगवान कृष्ण के जन्म के अवसर पर की जाती है।
- सबसे पहले पूजा स्थल को साफ करके भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप की मूर्ति स्थापित करें।
- लड्डू गोपाल को नए वस्त्र, मोरपंख और फूलों से सजाएं।
- भगवान के लिए छोटा-सा झूला सजाएं।
- निशीथ काल में भगवान कृष्ण का पंचामृत से अभिषेक करें।
- उन्हें नए वस्त्र पहनाकर चंदन, फूल और तुलसी अर्पित करें।
- माखन-मिश्री, दूध, दही, फल और अन्य सात्विक व्यंजनों का भोग लगाएं।
- भगवान श्रीकृष्ण की आरती करें और जन्मोत्सव मनाएं।
- परिवार के सदस्यों के बीच प्रसाद वितरित करें।
जन्माष्टमी व्रत कथा-
धार्मिक ग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार, द्वापर युग में मथुरा के राजा कंस के अत्याचार से प्रजा परेशान थी। कंस को आकाशवाणी से ज्ञात हुआ कि उसकी बहन देवकी का आठवां पुत्र उसका वध करेगा। इसके बाद कंस ने देवकी और उनके पति वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया। देवकी के छह पुत्रों का कंस ने वध कर दिया। सातवें गर्भ में भगवान शेषनाग के अंश माने जाने वाले बलराम जी का जन्म हुआ, जिन्हें योगमाया की सहायता से रोहिणी के गर्भ में पहुंचाया गया। इसके बाद भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी की मध्यरात्रि में देवकी के आठवें पुत्र के रूप में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ।
मान्यता है कि भगवान कृष्ण के जन्म के समय कारागार के सभी पहरेदार सो गए और वसुदेव जी उन्हें लेकर गोकुल पहुंचे। वहां उन्होंने श्रीकृष्ण को नंद बाबा और यशोदा के घर पहुंचाया और वहां जन्मी कन्या को लेकर वापस कारागार लौट आए। बाद में श्रीकृष्ण ने गोकुल और वृंदावन में अपनी बाल लीलाएं कीं और बड़े होकर अत्याचारी कंस का वध किया। इसी दिव्य जन्म की स्मृति में हर वर्ष जन्माष्टमी का पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है।
व्रत का पारण कब करें-
जन्माष्टमी व्रत के पारण का समय सभी स्थानों और परंपराओं में एक जैसा नहीं होता। कई परंपराओं में भगवान कृष्ण के मध्यरात्रि जन्मोत्सव और पूजा के बाद व्रत खोला जाता है, जबकि कुछ वैष्णव परंपराओं में अगले दिन सूर्योदय या निर्धारित पारण समय के बाद व्रत खोलने की परंपरा है। इसलिए स्थानीय पंचांग और अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार ही पारण करना उचित है।