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अबूबकर की निजी अस्पताल में इलाज की मांग पर सुनवाई पूरी, दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला सुरक्षित

दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार को पीएफआई नेता ई. अबूबकर की उस याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया, जिसमें उन्होंने अपने खर्च पर निजी अस्पताल में इलाज कराने की अनुमति मांगी है। अबूबकर को 2022 में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने एक कथित आतंकी मामले में गिरफ्तार किया था। उन्हें केंद्र सरकार द्वारा पीएफआई को प्रतिबंधित संगठन घोषित करने के बाद देशभर में चलाए गए अभियान के दौरान पकड़ा गया था। न्यायमूर्ति स्वराना कांता शर्मा की पीठ ने अबूबकर के वकील और एनआईए के विशेष लोक अभियोजक (SPP) की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रखा।

अबूबकर की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि उन्हें एम्स पर भरोसा नहीं रहा, इसलिए उन्हें निजी अस्पताल में इलाज की अनुमति दी जाए। उन्होंने यह भी कहा कि कम से कम अपोलो अस्पताल में शारीरिक रूप से जांच के लिए भेजा जाए ताकि दूसरी राय ली जा सके। वहीं, एनआईए के विशेष लोक अभियोजक राहुल त्यागी ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि अबूबकर की ऐसी मांग पहले भी खारिज की जा चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने भी निर्देश दिया है कि उनका इलाज केवल एम्स में ही किया जाए।

उन्होंने यह भी कहा कि दूसरी राय मेडिकल दस्तावेजों के आधार पर ली जा सकती है और उन्हें सरकारी अस्पतालों में इलाज की सुविधा उपलब्ध है। पीएफआई नेता होने के कारण उन्हें निजी अस्पताल भेजने में सुरक्षा संबंधी चिंताएं भी हैं। अदालत ने कहा कि अबूबकर को एम्स, सफदरजंग अस्पताल और सर गंगा राम अस्पताल में इलाज की सुविधा मिल सकती है। इस पर उनके वकील ने कहा कि ये सभी सरकारी अस्पताल हैं, जिस पर अदालत ने टिप्पणी की, “हम भी भारतीय हैं।”

इससे पहले 13 मार्च को अदालत ने इस याचिका पर एनआईए को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। अबूबकर ने अपने वकील अब्दुल शुकूर के माध्यम से याचिका दायर कर अपोलो या किसी अन्य निजी अस्पताल में अपने खर्च पर इलाज की अनुमति मांगी है। साथ ही, उन्होंने एक परिवार के सदस्य को अटेंडेंट के रूप में साथ रहने की अनुमति देने और दिल्ली आर्म्ड पुलिस को इलाज प्रक्रिया में हस्तक्षेप न करने के निर्देश देने की भी मांग की है।

याचिका में दावा किया गया है कि एम्स में उनका अनुभव “निराशाजनक” रहा है और वहां डॉक्टरों ने उनके साथ अपमानजनक व्यवहार किया। उन्होंने आरोप लगाया कि डॉक्टरों ने उन पर बीमारी का बहाना बनाकर जमानत पाने की कोशिश करने का आरोप लगाया, जो चिकित्सा नैतिकता और मानवीय व्यवहार के सिद्धांतों का उल्लंघन है। मामले में अदालत का फैसला अभी आना बाकी है।