प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 27 अक्टूबर को नई दिल्ली के भारत मंडपम में इमर्जिंग साइंस, टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन कॉन्क्लेव (ESTIC) 2026 का उद्घाटन किया। इस दौरान उन्होंने वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और डीप-टेक स्टार्टअप्स से अगले तीन वर्षों में ऐसे तकनीकी समाधान विकसित करने का आह्वान किया, जिनके नतीजे स्पष्ट हों और जिन्हें बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया जा सके।
इस सम्मेलन में दुनिया भर से 5,000 से अधिक वैज्ञानिक, नीति निर्माता, उद्योग जगत के प्रतिनिधि और स्टार्टअप शामिल हुए। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य वैज्ञानिक शोध को उद्योग, आम लोगों की जरूरतों और देश के विकास से जोड़ना है।
लैब से निकलकर आम लोगों तक पहुंचे तकनीक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि वैज्ञानिक खोजों का लाभ केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए। शोध को वास्तविक समस्याओं का समाधान करने और लोगों के जीवन को बेहतर बनाने में मदद करनी चाहिए। उन्होंने आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य के तहत देश की तकनीकी क्षमताओं को मजबूत करने पर भी जोर दिया। सम्मेलन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), क्वांटम टेक्नोलॉजी, एडवांस्ड मटेरियल और बायोटेक्नोलॉजी जैसे आधुनिक क्षेत्रों में भारत को वैश्विक स्तर पर आगे बढ़ाने पर चर्चा हुई।
400 से बढ़कर 2.3 लाख से ज्यादा हुए स्टार्टअप
केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत अब केवल दूसरी जगहों पर विकसित तकनीकों का इस्तेमाल करने वाला देश नहीं, बल्कि नई तकनीकों के विकास में वैश्विक भागीदार बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
उन्होंने बताया कि देश में स्टार्टअप की संख्या 2014 में करीब 400 थी, जो अब बढ़कर 2.3 लाख से अधिक हो गई है। इनमें अनुमानित 50 से 60 प्रतिशत स्टार्टअप टियर-2 और टियर-3 शहरों में हैं। इससे छोटे शहरों में भी तकनीकी उद्यमिता के विस्तार का पता चलता है।
जितेंद्र सिंह ने बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भारत की क्षमताओं को मजबूत करने के लिए जीन सिंथेसिस, सिस्टम्स बायोलॉजी और न्यूक्लियर मेडिसिन जैसे क्षेत्रों में घरेलू शोध और विकास को बढ़ावा देने की जरूरत बताई।
दो नोबेल पुरस्कार विजेताओं ने साझा की विशेषज्ञता
सम्मेलन में दो नोबेल पुरस्कार विजेताओं ने भी विशेष व्याख्यान दिए। वर्ष 2017 में रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार जीतने वाले कोलंबिया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक जोआखिम फ्रैंक ने क्रायो-इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी (Cryo-EM) के जरिए दवाओं की खोज और डिजाइन पर जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इस तकनीक से जैविक संरचनाओं को बेहद बारीकी से समझने में मदद मिलती है, जिससे दवाओं के विकास में सहायता मिल सकती है।
वहीं, वर्ष 1993 में फिजियोलॉजी या मेडिसिन का नोबेल पुरस्कार जीतने वाले रिचर्ड जे. रॉबर्ट्स ने जीन, जीन स्प्लाइसिंग और माइक्रोबियल जीनोमिक्स पर व्याख्यान दिया। उन्होंने जैव प्रौद्योगिकी के कृषि, सार्वजनिक स्वास्थ्य और बीमारी की जांच जैसे क्षेत्रों में इस्तेमाल पर भी चर्चा की।
AI और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग पर विशेष चर्चा
ESTIC 2026 में एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग, जनरेटिव AI और सिंथेटिक बायोलॉजी जैसे विषयों पर तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। इनमें घरेलू स्तर पर बड़े AI मॉडल विकसित करने, हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग की सुविधा बढ़ाने और AI के सुरक्षित इस्तेमाल जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई।
एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग सत्र में डिजिटल ट्विन, सहयोगी रोबोट, 3D प्रिंटिंग और मापन तकनीकों के जरिए औद्योगिक उत्पादन को मजबूत बनाने पर जोर दिया गया। साथ ही छोटे और मध्यम उद्योगों की सप्लाई चेन बेहतर करने पर भी विचार किया गया।
सिंथेटिक बायोलॉजी सत्र में स्वास्थ्य, कृषि और विनिर्माण के लिए जैविक प्रणालियों को डिजाइन करने और विकसित करने की संभावनाओं पर चर्चा हुई। इसमें बेहतर पोषण वाली फसलें, नई जैविक दवाएं और कचरे से उपयोगी उत्पाद तैयार करने जैसे विषय शामिल रहे।
₹1 लाख करोड़ के रिसर्च फंड पर भी जोर
सम्मेलन के पहले दिन की चर्चाओं में ₹1 लाख करोड़ के रिसर्च, डेवलपमेंट एंड इनोवेशन (RDI) फंड और अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (ANRF) से जुड़े तंत्र की भूमिका पर भी बात हुई। इन माध्यमों से शोध को शुरुआती चरण से आगे बढ़ाकर व्यावसायिक उत्पादों में बदलने में मदद मिलने की उम्मीद है।
ESTIC 2026 में कुल 12 प्रमुख विषयगत क्षेत्रों पर ध्यान दिया जा रहा है। सम्मेलन का उद्देश्य वैज्ञानिक शोध, उद्योग, सरकार और स्टार्टअप के बीच सहयोग बढ़ाना है, ताकि भारत नई तकनीकों के विकास में अपनी भूमिका मजबूत कर सके और उनका लाभ देश के साथ-साथ दुनिया के लोगों तक भी पहुंच सके।