बुंदेलखंड में पानी की समस्या से निपटने और खेती को बेहतर बनाने के लिए योगी सरकार अब जल प्रबंधन और आधुनिक कृषि तकनीक पर जोर दे रही है। इंडिया-इजराइल बुंदेलखंड वाटर प्रोजेक्ट के तहत झांसी के गंगावली में चल रहे मिनी पायलट प्रोजेक्ट में यह जांचा जा रहा है कि उपलब्ध पानी का वैज्ञानिक तरीके से इस्तेमाल कर कम पानी में ज्यादा और बेहतर फसल कैसे पैदा की जा सकती है। परियोजना के अगले चरण में ड्रिप, स्प्रिंकलर, ऑटोमेटेड इरिगेशन, सोलर पंपिंग, वाटर बजटिंग और संरक्षित खेती जैसी तकनीकों को बुंदेलखंड की स्थानीय परिस्थितियों में परखा जाएगा। सफल तकनीकों को बाद में किसानों के अपने खेतों तक पहुंचाने की योजना है।
जितना पानी, उतनी ही खेती का मॉडल
नमामि गंगे एवं ग्रामीण जलापूर्ति विभाग के विशेष सचिव और निदेशक, भूगर्भ जल विभाग डॉ. राजेश कुमार प्रजापति के मुताबिक, परियोजना में ‘जितना पानी उपलब्ध, उसी के हिसाब से खेती’ की अवधारणा पर काम किया जा रहा है। इसके लिए पांड वाटर बजटिंग के जरिए तालाब में उपलब्ध उपयोगी पानी का आकलन किया जाएगा। इसी आधार पर फसल क्षेत्र और गर्मी की फसलों के लिए पानी की सीमा तय करने का प्रस्ताव है। इससे जरूरत से ज्यादा पानी निकालने के बजाय उपलब्ध जल का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकेगा।
बुंदेलखंड जैसे जल-संवेदनशील क्षेत्र में वाटर बजटिंग को परियोजना का अहम हिस्सा बनाया गया है। किसानों को प्रशिक्षण के दौरान तालाब में उपलब्ध पानी का हिसाब रखने और उसके आधार पर खेती की योजना बनाने की जानकारी दी जाएगी। इस व्यवस्था से अनियंत्रित सिंचाई और जरूरत से ज्यादा भूजल निकालने पर रोक लगाने में मदद मिल सकती है। साथ ही सीमित पानी में कृषि उत्पादकता बढ़ाने का रास्ता तैयार होगा।
परियोजना के शुरुआती चरण में भूजल स्तर में सुधार को लेकर अभी कोई स्पष्ट मात्रात्मक निष्कर्ष सामने नहीं आया है। हालांकि, भविष्य में परियोजना के वास्तविक प्रभाव का आकलन करने के लिए बोरवेल और ऑब्जर्वेशन वेल की व्यवस्था की गई है। इनके जरिए जल स्रोत और पानी के इस्तेमाल की निगरानी की जाएगी। प्री-प्रोजेक्ट और पोस्ट-प्रोजेक्ट भूजल आंकड़ों की तुलना कर यह पता लगाने की कोशिश होगी कि जल दक्षता बढ़ाने वाली तकनीकों से भूजल पर दबाव कितना कम हुआ।
इंडिया-इजराइल सहयोग के तहत परियोजना में माइक्रो इरिगेशन, ड्रिप, स्प्रिंकलर, ऑटोमेटेड इरिगेशन, SCADA, सोलर पंपिंग, रिजर्वायर आधारित जल प्रबंधन, वाटर बजटिंग और संरक्षित खेती जैसी तकनीकों का इस्तेमाल और प्रदर्शन किया जा रहा है। इसका उद्देश्य सिर्फ विदेशी तकनीक को लागू करना नहीं, बल्कि यह देखना है कि बुंदेलखंड की जमीन और मौसम के हिसाब से कौन सी तकनीक ज्यादा कारगर है। इसके लिए पानी की खपत, सिंचाई दक्षता, फसल उत्पादन, खेती की लागत और जल उत्पादकता जैसे आंकड़ों को दर्ज किया जाएगा।
परियोजना के अगले चरण में जलाशय से खेतों तक पाइपलाइन बिछाने, ड्रिपलाइन और स्प्रिंकलर लगाने की योजना है। इसके साथ ग्रीनहाउस, टनल और सिंचाई स्वचालन प्रणाली को भी क्रियाशील किया जाएगा। किसानों को खाद और उर्वरक के सही इस्तेमाल, वाटर बजट बनाने, फसल की योजना तैयार करने और कृषि यंत्रों के संचालन की ट्रेनिंग भी दी जाएगी। यानी किसानों को सिर्फ सिंचाई की सुविधा नहीं, बल्कि पानी और खेती की लागत को बेहतर तरीके से मैनेज करने की तकनीक भी सिखाई जाएगी।
गंगावली में बनाए गए डेमोस्ट्रेशन फार्म में जिन तकनीकों के अच्छे परिणाम मिलेंगे, उन्हें किसानों के खेतों में भी अपनाने का अवसर दिया जाएगा। इससे यह परियोजना केवल प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि सफल तकनीकों को बड़े स्तर पर किसानों तक पहुंचाने का आधार बनेगी।
हर फसल और पानी की हर बूंद का रिकॉर्ड
परियोजना में केवल निर्माण कार्यों की निगरानी नहीं होगी, बल्कि खेतों पर होने वाले परिणामों का भी रिकॉर्ड रखा जाएगा। इसमें फसल उत्पादन, पानी की खपत, पानी का वितरण, कृषि सामग्री, खेती की लागत, सकल लाभ और किसानों द्वारा नई तकनीक अपनाने जैसे आंकड़े शामिल होंगे। खेतों से जुड़े रिकॉर्ड डिजिटल रूप में दर्ज किए जाएंगे। मौसम के अनुसार किसानों के परिणामों का सूचना-पटल तैयार करने की व्यवस्था भी प्रस्तावित है। इससे परियोजना के असर का वैज्ञानिक तरीके से मूल्यांकन किया जा सकेगा।
कृषि और भूजल विभाग मिलकर करेंगे निगरानी
भूगर्भ जल विभाग के अधिशासी अभियंता एवं वैयक्तिक सहायक निदेशक अनुपम ने बताया कि परियोजना के परिणामों के सत्यापन के लिए कृषि, उद्यान और भूजल विभागों को तकनीकी सहयोग से जोड़ा गया है। इससे अलग-अलग विभागों की विशेषज्ञता का इस्तेमाल कर परियोजना के परिणामों की जांच की जा सकेगी और आगे की रणनीति तैयार करने में मदद मिलेगी।