केरल के वायनाड में बेशक भूस्खलन का भयानक रूप देखने को मिला, लेकिन साथ ही इंसानियत के पहलू भी सामने आए। मदद के लिए बेहिचक आगे आने वालों का तांता लगा रहा। इन्हीं में एक हैं दीपा जोसेफ। वे केरल की चंद महिला एंबुलेंस ड्राइवरों में एक हैं। अपने निजी नुकसान की परवाह किए बगैर वे वायनाड में पीड़ितों की मदद करती रहीं।
अधिकारियों ने उन्हें फ्रीजर और एंबुलेंस का बंदोबस्त करने को कहा। वे फौरन अपनी टीम के साथ जरूरी सामान लेकर भूस्खलन की जगह पहुंच गईं। दीपा और उनकी टीम भूस्खलन के कुछ ही घंटों बाद चूरलमाला में थी। टीम अगले पांच दिनों तक वायनाड की पहाड़ियों में तैनात रही।
साल भर भी नहीं हुआ, जब दीपा ने अपनी बेटी को खो दिया था। वे बेहद दुखी रहती थीं। यहां तक कि एंबुलेंस चलाना भी छोड़ दिया था। वायनाड में भूस्खलन से हुई तबाही ने जीवन के लिए उनका नजरिया बदल दिया।
भूस्खलन की मार झेलने वाले चूरलमाला और मुंडक्कई में लापता लोगों की तलाश दसवें दिन भी जारी रही। वहां 1,000 से ज्यादा सुरक्षा कर्मी और 500 से ज्यादा स्वयंसेवकों के अलावा भारी-भरकम मशीनें तैनात हैं। 30 जुलाई को वायनाड के मुंडक्कई और चूरलमाला में हुए विनाशकारी भूस्खलन से मरने वालों की संख्या 226 पहुंच गई है।