दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को जंतर-मंतर पर चल रहे कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शनकारियों की कथित पुलिस निगरानी को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) पर सोमवार को सुनवाई करने पर सहमति जताई। याचिका में आरोप लगाया गया है कि दिल्ली पुलिस प्रदर्शनकारियों की लगातार निगरानी कर रही है, जिससे उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की खंडपीठ के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता नंदिता राव ने मामले की जल्द सुनवाई की मांग की। अदालत ने इसे स्वीकार करते हुए याचिका को सोमवार के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया। यह जनहित याचिका जेएनयू छात्रसंघ (JNUSU) की पूर्व अध्यक्ष आइशी घोष ने अधिवक्ता सुभाष चंद्रन के.आर. और अनिरुद्ध के.पी. के माध्यम से दायर की है।
याचिका के अनुसार, छात्र नेता अभिजीत डिपके के नेतृत्व में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के कार्यकर्ता 20 जून से जंतर-मंतर पर धरना और भूख हड़ताल कर रहे हैं। आरोप है कि प्रदर्शन शुरू होने के बाद से दिल्ली पुलिस लगातार प्रदर्शनकारियों की फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी और 24 घंटे निगरानी कर रही है। इसके लिए प्रदर्शन स्थल पर एक स्थायी निगरानी टॉवर भी लगाया गया है। याचिका में कहा गया है कि यह निगरानी बिना किसी स्पष्ट कानूनी आधार, प्रक्रिया या संवैधानिक अनुमति के की जा रही है।
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि पुलिसकर्मियों ने छात्र प्रदर्शनकारियों से कहा कि उनकी तस्वीरें और वीडियो उनके माता-पिता, अभिभावकों और शैक्षणिक संस्थानों को भेज दिए जाएंगे। याचिकाकर्ता का कहना है कि इससे छात्र डर के कारण प्रदर्शन में शामिल होने से बच रहे हैं और उनके अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार पर असर पड़ रहा है।
याचिका में दावा किया गया है कि भारी बारिश के दौरान भी महिला प्रदर्शनकारियों की लगातार फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी की गई, जबकि पर्याप्त आश्रय न होने के कारण वे भीगे हुए कपड़ों में वहीं मौजूद थीं। इसे उनकी निजता और गरिमा का उल्लंघन बताया गया है।
याचिका में हाईकोर्ट से मांग की गई है कि:
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शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की लगातार निगरानी को असंवैधानिक घोषित किया जाए।
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जंतर-मंतर पर सामूहिक फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी पर रोक लगाई जाए, जब तक सार्वजनिक व्यवस्था को वास्तविक खतरा साबित न हो।
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निगरानी का कानूनी आधार और डेटा संग्रह, संरक्षण व उपयोग से जुड़े नियम सार्वजनिक किए जाएं।
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अवैध रूप से एकत्र किए गए व्यक्तिगत डेटा को नष्ट किया जाए।
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शांतिपूर्ण प्रदर्शनों में निगरानी को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाए जाएं।
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पूरे मामले की जांच के लिए एक स्वतंत्र समिति का गठन किया जाए।
याचिका में कहा गया है कि इस तरह की निगरानी संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है और सुप्रीम कोर्ट के के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ फैसले में तय किए गए निजता के मानकों पर भी खरी नहीं उतरती।