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Delhi: जल संकट से निपटने के लिए सदियों पुरानी बावलियों को पुनर्जीवित कर रही सरकार

Delhi: दिल्ली सिर्फ कंक्रीट का जंगल और शोर का शहर नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर पानी की एक समृद्ध और भूली-बिसरी कहानी समेटे हुए है। ये एक ऐसी भाषा छिपाए हुए है जो पत्थरों पर उकेरी गई है और इस शहर की आपाधापी के नीचे चुपचाप बहती रहती है। ये हैं शहर की बावलियां। ऐसी अद्भुत संरचनाएं, जिन्होंने कभी एक सूखे और अर्द्ध-शुष्क इलाके में जिंदगी को कायम रखने में अहम भूमिका निभाई थी।

पाइपलाइनों और पंपों के आने से बहुत पहले, ये बावलियां बारिश के पानी को इकट्ठा करके सहेजकर रखती थीं, जिससे लोगों को गर्मियों की भीषण तपिश से निपटने में मदद मिलती थी। 14वीं से 17वीं सदी के बीच बनी ये बावलियां, महज पानी की स्रोत भर नहीं थीं। बल्कि, ये लोगों के मेल-जोल की जगहें, चिंतन-मनन के स्थल और जलवायु के अनुकूल वास्तुकला के बेमिसाल नमूने भी थीं।

जैसे-जैसे शहरीकरण बढ़ा और पानी की पाइपलाइन घर-घर पहुंची, बावलियों की अहमियत कम हो गई और वे उपेक्षा का शिकार हो गईं। कई बावली बंद हो गईं, कई सूख गईं तो कई शहरी विस्तार के नीचे दबाकर भुला दी गईं।

हालांकि, अब यह स्थिति धीरे-धीरे बदल रही है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने महरौली में 'राजों की बावली' के जीर्णोद्धार का काम शुरू कर दिया है। इसके तहत मलबा हटाया जा रहा है, इसकी संरचना को मजबूत किया जा रहा है, और इसके ऐतिहासिक स्वरूप के कुछ हिस्सों को फिर से संवारा जा रहा है।

ऐसे वक्त में जब दिल्ली जैसे शहर गिरते भूजल स्तर, अनियमित मानसून और बढ़ते तापमान जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं, तब ये प्राचीन प्रणालियां एक बार फिर अहम और टिकाऊ समाधान के रूप में उभरने लगी हैं। ये बावलियां प्रकृति के साथ बेहतर तालमेल से काम करती थीं। इनका काम बारिश के पानी को इकट्ठा करना, भूजल स्तर को बेहतर बनाना और पानी की बर्बादी को कम करना था।

अब सवाल सिर्फ बावलियों को विरासत स्थलों के तौर पर सहेजने का ही नहीं है, बल्कि यह भी है कि क्या हम उनसे कुछ सीख सकते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि इन पत्थर की सीढ़ियों के नीचे एक ज्यादा टिकाऊ भविष्य का खाका छिपा हो सकता है।