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जब झूमती हुई आती थी बेदी की गेंद

वेद विलास उनियाल 

यह बात किसी और ने नहीं कही। पिच पर आग उगलती गेंदों के मशहूर माइकिल होल्डिंग ने कही है। उन्होंने कहा है कि बिशन सिंह बेदी की गेंद हवा में कविता की तरह होती थी। माइकिल होल्डिंग कोई जाने माने बल्लेबाज नहीं थे। लेकिन क्लाइव लायड के जमाने में बेस्टइंडीज के निचले क्रम के बल्लेबाजों में एक खूबी होती थी कि वक्त पड़ने पर वो भी चालीस पचास रन टीम के लिए जोड़ दिया करते थे। माइकिल होल्डिंग लायड की उस टीम में नहीं थे जो 1975 में भारत आई थी । तब भारत के महान स्पिनर बेदी चंद्रा प्रसन्ना ने जिस तरह अपनी स्पिन गेंदबाजी से मद्रास और कलकत्ता के टेस्ट जीते थे वो देखने था। लेकिन कुछ ही समय बाद जब भारत की टीम बिशन सिंह बेदी के नेतृत्व में वेस्टइंडीज गई तो वहीं माइकिल होल्डिंग ने बेदी की नाचती गेंदों को झेला होगा। विश्व के एक जाने माने गेंदबाज की दूसरे महान गेंदबाज के लिए यह बड़ी श्रंद्धाजलि है। वैसे बेदी ने इसके ठीक दस साल पहले 1966 में कलकत्ता टेस्ट में अपना पहला टेस्ट मैच खेला था। 

वास्तव में जिन्होंने बेदी को छोटे रनअप के साथ बाएं हाथ की गेंदबाजी करते देखा है वो समझ सकते हैं कि वेदी की झूमती नृत्य करती गेंद किस तरह विकेट लेती थी। बेदी की गेंदो का करिश्मा था कि बल्लेजबाज जितनी देर में यह समझता कि गेंद को बैक फुट पर खेले या लंबा शाट लगाएं उतनी देर में गेंद या तो विकेट गिरा देती या स्लिप प्वाइंट फारवर्ड शाटलेग पर किसी सोल्कर या आबिद अली के हाथों में होती। या विकेट के पीछे फारुख इंजीनियर या किरमानी स्टंप उड़ा देते। बेशक बेदी ने 67 टेस्ट में जो 266 विकेट लिए उसका आंकड़ा आज के समय में 400 -500 विकेट के सामने छोटा लग सकता है। लेकिन उस समय जितनी क्रिकेट खेलती जाती है। और उस समय की परिस्थितियों को समझेंगे तो बेदी के इतने विकेट बहुत मायने रखते थे। 

इसे इस बात से समझा जा सकता है कि एक तऱफ भारत में चार-चार विश्व स्तरीय स्पिनर टीम में होते थे। वहीं वेस्टइंडीज लंबे समय तक अकेले लांस गिब्स के पास स्पिन गेंदबाजी की बागड़ोर रही। उनका साथ देने के लिए स्पिन गेंदबाज उसी स्तर पर होते थे जिस स्तर पर भारतीय टीम में मध्यम तेज गेंदबाज। आखिर लांस गिब्स 300 से ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज बने। इसी तरह इंग्लैड में डेरिक अंडर वुड का अपना जमाना रहा लेकिन दुनिया के महान बल्लेबाज भारतीय स्पिन के सामने जिस तरह नतमस्तक रहे वो एक करिश्मा था। निश्चित भारतीय स्पिनर अपनी-अपनी कलाओं के साथ थे। लेकिन भारतीय स्पिन गेंदबाजी का नेतृत्व बिशन सिंह बेदी ही कर रहे थे।


 
एक बार किसी महिला ने कमेंट्रेटर जसदेव सिंह को आत्मीयता से कहा था सरदारजी क्या आपका मुंह नहीं थकता है। अगर यही महिला कभी बिशन सिंह बेदी से मिली होती तो यही कहती सरदारजी दिन भर गेंद फेंकते-फेंकते क्या थकान नहीं लगती। पुराने दौर की क्रिकेट की जिन्हें याद हो वो बता सकते हैं कि भारतयी गंदेबाजी जब शुरू होती थी। तो करसन घावरी मदन लाल, मोहिंदर अमरनाथ जैसे किसी एक गेंदबाज एक छोर पर होता दूसरी तरफ से सुनील गावस्कर को दो तीन ओवर फिंकवाए जाते थे। इसके बाद बिशन सिंह बेदी शुरू हो जाते थे। सुबह भी बिशन सिंह बेदी के हाथ में और ढलती शाम में भी बिशन सिंह बेदी ही गेंद करते नजर आते थे। कमेंट्रेटर से ऐसा ही कुछ सुनने को मिलता था लेफ्ट आर्म ओवर द विकेट बेदी की गेंद डेविड गावर को ललचाती थी। कई बार बल्लेबाज उन गेंदो को बल्ले पर लपक कर बाउंड्री पार पहुंचाते थे। लेकिन ऐसी ही गेंदों के बीच कोई नजाकत वाली गेंद बल्लेबाज को हैरत में डाल देती थी। बेदी की उस गेंद का विश्लेषण करते-करते ही बल्लेबाज पेवेलियन की तरफ लौटता था। भारतीय स्पिन गेंदबाजी में चंद्रशेखर सबसे घातक गेंदबाजी करते थे। 

उनके बारे में कहा जाता था कि उन्हें मध्यम गति का तेज गेंदबाज भी कह सकते हैं। वास्तव में उनकी लेग स्पिन गुगली का जवाब नहीं था। एक बार चंद्रा को लाइन लेंथ मिल जाए तो पांच-छह विकट चटका देते थे। प्रसन्ना अपनी नपी तुली गेंदों के लिए जाने जाते थे। दुनिया के बेहतर आफ स्पिन गेंदबाजों में उन्हें माना जाता है। वेंकटराघवन की शानदार गेंदबाजी के बावजूद उन्हें अपने स्थान के कोशिश करनी पडी। लेकिन वो जितना खेले अपनी बेहतरीन स्पिन गेंदबाजी के लिए याद किए गए। बिशन सिंह बेदी फ्लाइट कराने के माहिर थे। सुनील गावस्कर ने उनके बारे में सही टिप्पणी की है कि वो दुनिया के बाएँ हाथ के सर्वश्रेष्ठ गेंदबाजों में थे। क्या गजब की स्पिन गेंदबाजी रही होगी कि लेग स्पिनर चंद्रा अपनी गुगली से बल्लेबाजों को तंग करते रहे। और बिशन सिंह बेदी आर्मर गेंद से बल्लेबाजों को हतप्रद करते रहे। फिरकी के इस कलात्मक गेंदबाज की बाएं हाथ से डाली गई आर्मर बल्लेबाज को गुगली जैसी भ्रम में डालती थी। गेंदबाजी करते हुए उन्हें लय में भागते देखना बहुत भाता था। उनकी गेंदबाजी कला का उत्कृष्ट रूप थी। 

बिशन सिंह बेदी की क्रिकेट को कई तरह से याद किया जाएगा। अनुशासन, स्पष्टवादिता, निर्णय लेने का कौशल टीम वर्क उनके अंदरूनी गुणों में था। वह अपनी क्रिकेट को तो ऊंचाई पर ले गए। लेकिन साथ-साथ उन्होंने भारत के भावी स्पिनरों का मार्गदर्शन भी किया। मनिंदर को निखारने में उनका बड़ा योगदान है। दिल्ली रणजी टीम को बेदी ने सफलता दिलाई। प्रथम श्रेणी के क्रिकेट में उनका अपना 1560 रन का रिकार्ड है। यह भी जानना रोचक है कि बेदी जैसे गेंद को फ्लाइट कराने वाले गेंदबाज ने 1975 के विश्व कप में बारह ओवर फेंक कर केवल छह रन दिए। एक विकेट भी लिया। बेदी ही थे जिन्होंने एक बार सरफराज नवाज के तीन बाउंसर को अपांयर के जरिए नजरअंदाज किए जाने पर टीम को वापस बुला दिया। और वेस्टइंडीज में अपनी पहली ही कप्तानी में उन्होंने एक बड़ा फैसला लिया था। जब लायड पोर्ट आफ स्पेन का टेस्ट हारने के बाद किसी भी तरह किंग्स्टन का मैच जीतना चाहते थे तो उन्होंने अपने तेजगेंदबाजों से बाउंसर बीमर गेंद फिंकवाई। टीम के प्रमुख बल्लेबाज घायल होते चले गए। आखिर बेदी ने विरोध जताते हुए पांच विकेट में पारी घोषित कर दी। बेदी बेहद चयनकर्ता के तौर पर भी सामने आए। मैदान में वह बेहद कड़क रहे। आस्ट्रेलिया में खराब प्रदर्शन पर उनकी टिप्पणी थी कि अगर कोई प्रशांत महासागर में डूबना चाहे तो उसे बचाया न जाए। 

इस दौर में क्रिकेट जगत ने दो महान स्पिनरों को खोया। आस्ट्रेलिया के लेग स्पिनर वार्न के जाने पर क्रिकेट की दुनिया गहरे दुख में डूबी। आज के माडिया सोशल मीडिया का प्रताप रहा कि शेन वार्न की गेंदों को हम रह रह कर देख पाए हैं। क्रिकेट के पर्दे पर बल्लेबाज को फेंकी गेंद साफ नजर आती है। शेन वार्न की कुल कलात्मक गेंद खेलप्रेमियों के लिए हैरत का कारण बनी। लेकिन बेदी के जमाने में इतना सब नहीं था। लोग अगले दिन अखबारों में बेदी की गेंद करती तस्वीर देख पाते थे। या फिर टीवी के धुंधले पर्दे पर बेदी को गेंद करते देख पाते थे। काश उस जमाने में रंगीन टीवी घर घर होता तो क्रिकेट प्रेमी स्पिन के उस फनकार को और बेहतर ढंग से समझ पाते। तब बस इतना ही सुख था कि बेदी की ये गेंद और टोनी ग्रेग उसे भांप नहीं पाए। वो आउट हो गए। अब बिशन सिंह बेदी की यादें हैं। हां यह भी अफसोस है कि उनकी क्रिकेट का आखरी दौर बहुत अच्छान हीं रहा। पाकिस्तान की पिच पर बेदी और उसके साथियों की स्पिन को जिस तरह माजिद मियांदाद और जाहिर अब्बास ने खेला, उसने बता दिया था कि भारत की स्पिन का एक युग मैदान से विदा हो रहा हैं। अब यह मायूस करती है कि स्पिन चौकड़ी के एक स्तंभ हमसे हमेशा के लिए दूर जा चुके हैं।