पणजी, पांच नवंबर (भाषा) मुंबई उच्च न्यायालय ने अधिकारियों को गोवा के एक परिवार के छह सदस्यों के नाम मतदाता सूची में शामिल करने का निर्देश देते हुए बृहस्पतिवार को कहा कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान भी जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 के प्रावधान लागू रहते हैं।
न्यायमूर्ति वाल्मीकि मेनेजेस और न्यायमूर्ति अमित एस जामसांडेकर की गोवा पीठ ने 44 पृष्ठों के फैसले में सांता क्रूज विधानसभा क्षेत्र के निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता परेश सालगांवकर और उनके परिवार के पांच अन्य सदस्यों के आवास की पुष्टि करने के बाद 10 दिन के भीतर उनके नाम मतदाता सूची के भाग 25 में शामिल करें।
याचिकाकर्ता 1995 से सांता क्रूज विधानसभा क्षेत्र में मतदान कर रहे थे। उन्होंने इसी निर्वाचन क्षेत्र के भाग 29 से भाग 25 में अपना आवास बदल लिया था। उन्होंने पता बदलने के लिए 12 नवंबर, 2025 को बूथ स्तरीय अधिकारी (बीएलओ) के माध्यम से फॉर्म-8 जमा किया था। यह आवेदन आठ दिसंबर, 2025 को ईआरओ के पोर्टल पर अपलोड किया गया था।
हालांकि, उनके वकील अधिवक्ता विवेक रोड्रिग्स ने बताया कि उनके नाम भाग 29 की मतदाता सूची से हटा दिए गए, लेकिन भाग 25 की मसौदा मतदाता सूची में शामिल नहीं किए गए। उन्होंने कहा कि इसके बाद निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) ने 21 जनवरी, 2026 को उनका फॉर्म-8 आवेदन खारिज कर दिया तथा इसके बाद जिला निर्वाचन अधिकारी और मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने भी उनकी अपीलें खारिज कर दीं।
उच्च न्यायालय ने कहा कि निर्वाचक पंजीकरण नियमों का नियम 25 मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण का प्रावधान करता है और नियम 4 से 23 तक के प्रावधान गहन पुनरीक्षण पर भी उसी तरह लागू होते हैं, जिस तरह मतदाता सूची पहली बार तैयार करते समय लागू होते हैं।
पीठ ने कहा, ''इसलिए नियम 25 में नियम 4 से 23 के तहत प्रविष्टियों में संशोधन करने और नई प्रविष्टियां शामिल करने की प्रक्रिया लागू करने के मामले में कोई अपवाद नहीं किया गया है, चाहे मामला गहन पुनरीक्षण का हो या संक्षिप्त पुनरीक्षण का।''
पीठ ने कहा कि ''मतदाता सूची को नए सिरे से तैयार करके विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) करने की प्रक्रिया के दौरान भी धारा 22 के साथ पठित नियम 13 के प्रावधान और नए मतदाता के लिए फॉर्म-6 या आवास बदलने वाले मतदाता के लिए फॉर्म-8 दाखिल करने की अनिवार्यता निलंबित नहीं होती।''
अदालत ने कहा, ''हम निर्वाचन आयोग की इस दलील को खारिज करते हैं कि विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया के दौरान निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) कानून के तहत फॉर्म-8 पर कार्रवाई करने से इनकार कर सकता है।''
अदालत ने यह भी कहा कि संशोधित मतदाता सूची से किसी मतदाता का नाम हटाना, विशेषकर तब जब उसने उसी निर्वाचन क्षेत्र के भीतर आवास बदलने के लिए पहले ही फॉर्म-8 जमा कर दिया हो और उसे अपना पक्ष रखने का अवसर भी न दिया गया हो, ''नागरिक के मतदान के अधिकार से वंचित करने के समान होगा।''
फॉर्म-6 और फॉर्म-8 के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए पीठ ने कहा कि फॉर्म-6 ऐसे नए मतदाता के लिए है, जिसका नाम पहले कभी किसी मतदाता सूची में शामिल नहीं रहा हो, जबकि फॉर्म-8 ऐसे व्यक्ति के लिए निर्धारित है, जिसका नाम पहले से मतदाता सूची में है और जो अपना आवास बदलना चाहता है।
फैसले में कहा गया, ''एक आवास से दूसरे आवास पर जाने वाला मतदाता केवल फॉर्म-8 में ही आवेदन कर सकता है।''
अदालत ने कहा कि यदि याचिकाकर्ताओं ने फॉर्म-6 जमा किया होता तो उन्हें यह झूठी घोषणा करनी पड़ती कि उनका नाम पहले किसी विधानसभा या संसदीय निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में शामिल नहीं था।
पीठ ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 22 के प्रावधान का भी उल्लेख किया, जिसके तहत मतदाता सूची में किसी प्रविष्टि को हटाने या उसमें बदलाव करने से पहले संबंधित मतदाता को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिया जाना अनिवार्य है।
अदालत ने कहा कि मौजूदा मामले में याचिकाकर्ताओं का फॉर्म-8 आवेदन 11 दिसंबर, 2025 को एसआईआर का गणना चरण समाप्त होने से पहले ही प्राप्त हो गया था। उसने कहा कि बूथ स्तरीय अधिकारी (बीएलओ) ने क्षेत्रीय सत्यापन पूरा कर लिया था और आवेदन 17 जनवरी, 2026 को ईआरओ को भेज दिया गया था।
पीठ ने कहा कि 16 दिसंबर, 2025 को मसौदा मतदाता सूची प्रकाशित होने के समय ईआरओ को फॉर्म-8 आवेदन लंबित होने की जानकारी थी।
अदालत ने कहा, ''कम से कम मसौदा मतदाता सूची पर आपत्तियां दर्ज कराने के चरण में ईआरओ का कर्तव्य था कि वह फॉर्म-8 पर विचार करता।''
फैसले में कहा गया कि ''ईआरओ की ओर से फॉर्म-8 आवेदन को खारिज करने का कोई औपचारिक आदेश पारित नहीं किया गया है।''
पीठ ने सहायक निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी की ओर से जिला निर्वाचन अधिकारी को 20 फरवरी, 2026 को भेजे गए एक पत्र की भी पड़ताल की जिसमें कहा गया था कि फॉर्म-8 आवेदनों पर कार्रवाई करते समय ईआरओनेट प्रणाली पर ''ईपीआईसी विवरण के लिए कोई रिकॉर्ड नहीं मिला'' संदेश दिखाई दे रहा था। पत्र के अनुसार, प्रणाली में ईआरओ के पास केवल एक विकल्प उपलब्ध था, जो आवेदन को ''खारिज'' करना था।
फैसले में कहा गया, ''याचिकाकर्ताओं के फॉर्म-8 आवेदन को खारिज करने का वास्तविक कारण ईआरओ को धारा 22 के साथ पठित नियम 13 के अनुरूप आदेश पारित करने से रोकने वाली प्रणाली थी।''
अदालत ने कहा कि ऐसा करना ''यह अधिनियम की धारा 22 के साथ पठित नियम 13 के प्रावधानों को निलंबित करने के समान होगा, जिसकी अनुमति नहीं दी जा सकती।''
पीठ ने यह भी कहा कि बीएलओ ने याचिकाकर्ताओं के नए पते पर उन्हें पहले से भरा हुआ गणना फॉर्म देने से इनकार कर दिया था, क्योंकि उसमें उनका पुराना पता दर्ज था, साथ ही, खाली गणना फॉर्म जारी करने का कोई प्रावधान नहीं था।
अदालत ने कहा, ''यदि याचिकाकर्ताओं को यह फॉर्म दे भी दिया जाता तो वे स्पष्ट रूप से गलत घोषणा करते, क्योंकि फॉर्म में उनका पहले से भरा हुआ पुराना पता दर्ज था, जहां से वे अपना आवास बदल चुके थे।''
उच्च न्यायालय ने एसआईआर को चुनौती देने वाली अन्य राज्यों की याचिकाओं पर उच्चतम न्यायालय के फैसले तक मौजूदा याचिका को स्थगित रखने के निर्वाचन आयोग के अनुरोध को भी खारिज कर दिया।
पीठ ने कहा कि मौजूदा याचिकाकर्ताओं ने एसआईआर को चुनौती नहीं दी है और उनकी याचिका केवल फॉर्म-8 आवेदन खारिज किए जाने तक सीमित थी।
अदालत ने इस आधार पर याचिका स्वीकार कर ली और परमादेश जारी करते हुए ईआरओ को छह याचिकाकर्ताओं के नाम मतदाता सूची में शामिल करने का निर्देश दिया।
पीठ ने निर्वाचन आयोग के उस अनुरोध को भी खारिज कर दिया, जिसमें उच्चतम न्यायालय में अपील दायर करने के लिए उच्च न्यायालय के फैसले पर दो सप्ताह की रोक लगाने का अनुरोध किया गया था।
भाषा अमित पवनेश
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