मुंबई, पांच नवंबर (भाषा) मुंबई उच्च न्यायालय ने कहा है कि प्राकृतिक रूप से संतान पैदा करने में असमर्थ दंपतियों के लिए किराये की कोख (सरोगेसी) उम्मीद की एक किरण है।
अदालत ने 50 वर्ष से अधिक उम्र के एक दंपती को राहत देते हुए उन्हें किराये की कोख प्रक्रिया अपनाने के लिए पात्रता प्रमाणपत्र जारी करने का आदेश दिया।
न्यायमूर्ति भारती डांगरे और न्यायमूर्ति आशीष चव्हाण की पीठ ने बुधवार को सुनाये गये फैसले में नासिक नगर निगम (एनएमसी) के सक्षम प्राधिकारी द्वारा जुलाई में पारित उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें दंपती के किराये की कोख (विनियमन) अधिनियम के तहत पात्रता प्रमाणपत्र जारी करने के आवेदन को खारिज कर दिया गया था।
इस फैसले की प्रति बृहस्पतिवार को उपलब्ध कराई गई।
लेखक लिन युतांग के कथन का हवाला देते हुए पीठ ने कहा, ‘‘महिलाओं के सभी अधिकारों में सबसे बड़ा अधिकार मां बनने का है।’’
उच्च न्यायालय ने कहा कि प्राकृतिक रूप से संतान पैदा करने में असमर्थ व्यक्तियों और दंपतियों के लिए सरोगेसी उम्मीद की एक किरण है।
पचास वर्ष से अधिक उम्र के इस दंपती ने किराये की कोख अधिनियम के तहत पात्रता प्रमाणपत्र जारी करने के उनके आवेदन को खारिज किए जाने के फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। उनका आवेदन केवल इस आधार पर खारिज किया गया था कि महिला निर्धारित अधिकतम आयु सीमा पार कर चुकी थी।
अधिनियम के तहत किराये की कोख का विकल्प अपनाने के इच्छुक दंपती का विवाहित होना अनिवार्य है। पात्रता प्रमाणपत्र जारी होने के दिन महिला की उम्र 23 से 50 वर्ष के बीच, जबकि पुरुष की उम्र 26 से 55 वर्ष के बीच होनी चाहिए।
इस मामले में पति की उम्र 53 वर्ष थी, जबकि उनकी पत्नी 54 वर्ष की थीं। इसी आधार पर नासिक नगर निगम के सक्षम प्राधिकारी ने उन्हें पात्रता प्रमाणपत्र जारी करने से इनकार कर दिया था।
दंपती ने अपनी याचिका में कहा कि इस तरह की पाबंदी उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि वे कई वर्षों से प्राकृतिक तरीके और आईवीएफ के जरिए संतान पैदा करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली।
पीठ ने एनएमसी के संबंधित सक्षम प्राधिकारी को दंपती के पक्ष में पात्रता प्रमाणपत्र जारी करने का आदेश दिया।
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देवेंद्र माधव
माधव